संदेश

क्या हम यह बात कभी सोचें कि हम गुस्से में क्यों चिल्लाते हैं? हालांकि हम जिस पर चिल्लाते हैं, वह हमारे बहुत करीब ही उपस्थित हो फिर भी हमारे आवाज उच्च स्तरीय ही रहती। हम उन से ऊँची आवाज में बोलते न तो उनसे बात किए बिना चुप रह जाते।

इसका क्या कारण हो सकता है, जरा देखें इस घटना को।

एक बार एक संत नहाकर नदी से बाहर निकले , तब तट पर खडे हुए दो आदमी बडी ही ऊँची आवाज में एक दूसरे को गुस्से से कोस रहे थे। इसे देखकर संत अपने चेलों से यह प्रश्न पूछे कि जब आदमी गुस्से में हो तब क्यों चिल्लाने लगता है?

एक शिष्य ने कहा कि जब लोग गुस्से में होते तब वे अपने मनश्शांति को खो बैठते। इसलिए पास होने पर भी वे उनपर आवाज उठाते हैं। ऐसे सारे शिष्यों ने अपने अपने मन के विचारों को व्यक्त किए।

अंत में संत ने सारे चेलों को संबोधित करते हुए बोले कि, जब मनुष्य गुस्से में रहता तब उसका मन जिस पर क्रोध में हो, उसके पास होते हुए भी अपने आप को बहुत दूरी का अंदाजा महसूस करता। इसलिए वह चिल्लाता है।

किन्तु जब किसी के साथ प्यार से बात करेंगे तब हमारे आवाज बहुत ही कम स्थाई में रहती। लेकिन ऐसा क्यों होती है? क्योंकि प्यार ज्यादा होने पर मन उनके बहुत करीब आ जाती।

कभी कभी गुनगुनाते न तो सिर्फ नजरों से ही अपने मन की बातों को विनिमय करते, जहाँ अपने मुँह तक खोलने की जरूरत नहीं पडती। सिर्फ सन्नाटा छा जाती।

आखिर संतजी का संदेश यही है कि , सबके साथ मन की दूरी बढाने का व्यवहार कभी न करें । यदि दूर बढती जाये तो अंत में बिछडकर दोनों के राह अलग हो जाने की संभावना है।

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