परपीड़न

जिंदगी में हमें कई तरह के लोगों से मेलन-जोलन होती रहती है। इनमें से सहानुभूति गुणवालों के साथ होने पर हमें बहुत ही चैन मिलती है। लेकिन कभी कभी परपीडकों का भी साथ देना पडता है, जबकि उनके साथ होने से हमें परेशानी और कष्ट के सिवा कुछ नहीं मिलती। यदि ऐसे लोग जीवन साथी हो तो मानें जिंदगी कितना बड़ा ही कष्टदायक हो जाती।

ऐसी हालत में उस गृहिणी के ससुराल के घरवाले उस औरत पर कितना जुल्म बेवजह करते हैं इसे शब्दों में वर्णन करना तो नामुमकिन है। यदि वो लोग इस समाज में “गोमुख व्याघ्रः” के रूप में मौजूद होंगे तो मानें उस औरत की दशा पर किसी को भी यकीन तक नहीं होगी।

हमारे देश में कई ऐसी गृहिणियाँ आज भी सारी ऐसी जुल्मों को बरदाश्त करके जी रही हैं। उन्हें बाहर काम करने के लिए इजाजत नहीं दी जाती। क्योंकि यदि वह औरत

कमाने लगेगी तो अपने पैरों पर खडी हो जाती और इन परपीडकों को, अत्याचार करने के लिए मौजूद स्त्री उनके हाथों से छूट जाने की संभावना है। सिर्फ इसीलिए।

मैं तो सिर्फ इस हालत में बदलाव लाने के लिए तरस रही हूँ।

11 thoughts on “परपीड़न”

  1. Exactly…. but sad part is that this is still prevailing in our societies., in this modern world :(… even in many relationship stories on my blog… I have also tried to reveal the same pain… I have seen many such families either while working for women rights or in the lives of my known people 😦

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