संत्रास

एक साँप तेज से घिसटती हुई चल रही थी। एक बंदर के बच्चे को उस साँप को पकडने को मन लगी और तुरंत उसे पकड़ ली। तभी साँप अपने मुँह खोलकर बंदर को काटने की चेष्टा की जिसके विषैल खांगा को देखकर बंदर भयभीत होकर काँपती हुई चीखने लगी। इसकी चीख सुनकर सारे बंदर उसके पास पहूँच गए। लेकिन सब उस विषैल सर्प को देखकर पानी का पानी हो गए। सभी को यह समझ में आ गई कि जब बंदर अपनी पकड को थोड़ा ढीला करेगी, तुरंत साँप उसे काटकर मार डालेगी। इसलिए सारे बंदरों का झुंड छोटी बंदर को निस्सहायता से देखकर उसे अपने तकदीर पर छोड़कर चले गए।

बंदर का बच्चा अपनी ही झुंड की निस्सहायता तथा अपनी शैतानी पर बहुत ही दुखी होकर , डर से रोदन करने लगी। समय काट रही थी। बंदर धीरे धीरे अपने विश्वास खोने लगी। भूख और प्यास उसे सताने लगी।बहुत देर हो गई। उसे चक्कर आने लगी। तभी वहाँ एक संत आए। उन्हें बंदर की हालत मालूम हो गई। उन्होंने बंदर से साँप को फेंक देने की सलाह दी। बंदर साँप के काटने की डर को व्यक्त की। संत ने कहा साँप बहुत देर पहले ही मर गई है। तभी बंदर को सूझी कि अपने मजबूत पकड़ के कारण साँप मर गई है।

इसी तरह हमलोगों में से ज्यादातर लोग चिंता नामक साँप को पकडकर इसे छोडे बिना अपने आप को सदा के लिए दुखी रखते हैं। चिंता को दूर करने से ही सुख मिलती है।

घमंड से हृदय संबंधित, चिंता से पेट संबंधित, दुःख तथा रोदन से श्वास संबंधित, भय और शक से गुर्दा संबंधित और गुस्सा या जलन उत्तोलक संबंधित बीमारियों का कारण होता है। शांतिपूर्ण जीवन ही बेहतरीन जीवन होता है। तन्दुरुस्ती बदन से ही बेहतरीन  सोच विचारों का आविष्कार होता है। बेहतरीन जीवन के लिए अच्छे रास्ते को अपनाएँ और आगे बढें।

6 thoughts on “संत्रास”

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