ईश्वर की मांग

भगवान हमसे क्या चाहते हैं??

राजर्षि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए उनके साथ गए हुए श्री राम, अपने दिएहुए कर्तव्य का पालन किए। बाद में मिथिला नगर गए और वहाँ शिव धनुष को तोड़कर, सीतामाता से ब्याह करके अयोध्या लौटे।अयोध्या में श्री रामजी को स्वागत करने केलिए और उन्हें अपने अपने ताकत के भेंट देने के लिए राज्य के लोग इकट्ठे हुए थे। उनमें से मित्रबंधु नामक एक मोची भी शामिल था।

वह श्री रामजी को भेंट में देने के लिए जूतों का सटीक जोडा बनाकर लाया था। लेकिन जब वह, औरों के महंगे तोफे को देखा तो अपने मन ही मन यह सोचकर उदास हो गया कि अपना मेहनत का तोफा, उसे बेकार लगा। वह चुपचाप भीड़ से हटकर वापस अपने घर जाने के लिए तैयार हो गया।

भगवान श्री राम ने उसे देख लिए। उन्होंने तुरंत उसे अपने पास बुलाए और प्यार से मित्रबंधु के भेंट को स्वीकार किए। और उससे कहे कि, ये जूते ही अपने पैरों के रक्षक होंगे।

जब श्री रामजी को वनवास जाना पडा ,तब उन्होंने अपने माता से अनुमति लेकर सिर्फ इन जूतों को पहनकर गए। इन्हीं जूतों को बाद में अयोध्या के राजगद्धी पर बैठने का सौभाग्य मिला। सिर्फ सच्चे दिल से समर्पित भेंट ही सदा भगवान के प्रीतिदायक हो सकता है।

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