तीन तरह के लोग।

   श्री महाविष्णु, अपने वाहन गरुड़ के साथ संभाषण कर रहे थे। तब विष्णु ने गरुड़ से पूछा कि लोग कितने तरह के होते हैं। गरुड़ विनम्रता से कहा कि, ” हे प्रभु!! आप सर्वांतर्यामी हैं और सब कुछ ठीक तरह से जानते हुए भी मुझसे कहलाना चाहते हैं। फिर भी मैं अपने दिमाग की सोच को आपसे कहता हूं।”

   मनुष्य तीन तरह के होते हैं।                            पक्षियों की तरह रहने वाले लोग। जैसे पक्षियां घोंसले बनाते हैं और इसमें अपने बच्चों को जन्म देती हैं और इन्हें खिलाती हैं। यदि सांप या अन्य कोई जानवर इनके बच्चों को खा लिया तो ये पक्षियां कुछ देर तक खिन्न रह जाती हैं और बाद में फिर से अपने दैनिक चर्या में जुट जाती हैं। इसी तरह कुछ लोग अपने ताक़त के काम करते हैं और इससे जो कुछ भी मिलती है, उसी से वैसे ही रह जाते हैं। इन्हें बेहतर जीवन-विधान की चिंता कभी भी नहीं होती।

     गाय और बछड़े जैसे लोग। गाय और बछड़े जहां भी हो , अपने मां और औलाद को ठीक तरह से पहचान सकते हैं। लेकिन ज्यादातर इन दोनों को अलग अलग ही बांधा जाता है। एक -दूसरे के पास जाने के लिए तरसते हैं, लेकिन उन्हें बांधी गई रस्सी उन्हें पास जाने से रोकती है। इसी तरह कुछ लोग ईश्वर को पहचानते हैं। लेकिन उन्हें रिश्ते नामक रस्सी भगवान तक जाने से रोकती है।

पति-पत्नी जैसे। घर के परिवार के लोगों के द्वारा की गई संबंध में , शुरू में पति अपने पत्नी की लापरवाही करता है। लेकिन वे पत्नी सब कुछ ( ख़ान बनाना, अपने को सजाना, पति की सेवा करना जैसे) अपने पति को खुश रखने के लिए करती रहती है। कई दिनों के बाद, वह पति धीरे धीरे अपनी पत्नी पर श्रद्धा लेना शुरू करता है। इसी तरह आरंभ में लोग भगवान की लापरवाही करते हैं। लेकिन काल उन्हें ईश्वर के महत्व को समझाता है। अंत में वे सदा भगवान को स्मरण करना ही अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण बात मानते हैं।

इस तरह गरुड़ ने विष्णु भगवान से अपने सोच विचार को व्यक्त किए।

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