काशी यात्रा

थोड़ी दिन पहले हम अपने पूरे परिवार (जेठजी के, देवर और सम्बंधी जी के साथ) काशी यात्रा पर निकले।

पहले हमें रामेश्वर जाना चाहिए। रामेश्वर में से धनुषकोडी तक रवाना हो कर वहां संकल्प लेना है। समुद्र स्नान करके, हाथ भरके रेत लाकर , समुद्र तट पर तीन शिवलिंग बनाना है। धनुष का चित्र खींचकर सबका पूजन करना है। एक लिंग सेतु माधव, दूसरा बिंदु माधव और तीसरा वेणी माधव। सेतु माधव को समुद्र में ही विसर्जन करना है। बिंदु माधव को पुरोहित को दान में देना है। और वेणी माधव को अपने साथ प्रयागराज ले जाना है। बाद में हमें ३६बार समुद्र स्नान करना है। वैसे ही रामनाथस्वामी मंदिर जाकर वहां के २२कुएं के पानी में नहाना है। भारत देश के पवित्र नदियों का पानी इन कुआओं में मौजूद हैं। यहां हमसे किएगये पापकर्मों से विमोचन के लिए प्रार्थना करके पुरोहित के घर में पित्रुओं के लिए श्राद्ध करना है। पिंडदान देना है।

प्रयागराज— हरेक व्यक्ति को अपने जीवन में तीन तरह के ऋण से मुक्ति पाना चाहिए। प्रयागराज में आत्मरुण से मुक्ति पाना चाहिए। इसके लिए स्नान करके संकल्प लेना चाहिए। हमारे साथ लाई गई वेणी माधव को लेकर त्रिवेणी संगम जाना है। यहां गंगा, यमुना और सरस्वती नदियां एक साथ मिलकर बहतीं हैं। सरस्वती अंतर्वाहिनी है। इस संगम में स्नान करने से पहले, हमें आत्मशुद्धि के लिए मर्द लोग मुंडन करना है और औरत वेणी दान (अपने बालों की छोटी सी हिस्सा काटकर) त्रिवेणी संगम में विसर्जित करना है। यहां की चमत्कार यह है कि, वस्तुत: बाल पानी में नहीं डूबती। लेकिन इस संगम में बाल डूब जाती है। हमारे साथ लाई गई वेणी माधव को भी संगम में हमें आत्मरुण से मुक्ति देने के लिए प्रार्थना करके विसर्जन करना चाहिए। यहीं से गंगाजल स्वीकार करते हैं। बाद में पुरोहित के यहां पित्रों को श्राद्ध और पिंडदान देना चाहिए। अक्षय वटवृक्ष के झाड़ यहीं से उत्पन्न होती है।

वाराणसी। :: वरुण, असि नदियां यहां बहने के कारण वाराणसी नाम सार्थक हुआ। यह क्षेत्र भगवान शिव के त्रिशूल पर स्थित है। प्रलय काल मे भी यह क्षेत्र अचल रहती है। काशी में भगवान विश्वनाथ, विशालाक्षी,अन्नपूर्णा, भैरव आदि के मंदिर स्थित हैं। अक्षय वट के तना इस क्षेत्र में स्थित है। यहां हमें देवरुण से मुक्ति पाने के लिए पंचतीर्थ श्राद्ध करना चाहिए। पहले असि घाट से । यहां हमारे साथ पुरोहित भी नांव में आते हैं। स्नान करके पिंडदान करना चाहिए। दूसरी घाट दशाश्वमेध घाट। यहां ब्रह्मदेव ने दस अश्वमेध यज्ञ किए हैं। यहां भी स्नान और पिंडदान। तीसरा त्रिलोचन घाट ( वरुण घाट)। चौथा पंचगंगा घाट। यहां स्नान करके १०० सीढ़ियों के ऊपर स्थित बिंदु माधव का दर्शन करने के बाद, पिंडदान देना चाहिए। पांचवीं घाट मणिकर्णिका घाट। यहां भी स्नान और पिंडदान देना है। इसके बाद हम वापस अपने बसेरे में लौट आए।

गया श्राद्ध । ::। गया पित्रुरुण विमोचन स्थान है। यहां सुबह उठकर स्नान करके फल्गुनी नदी ( साल भर सूखी रहती है) के तट पर पिंडदान देना चाहिए। यहां से विष्णु पाद तक जाकर वहां फिर से विष्णु पाद पर पिंडदान देना चाहिए। फिर से अपने स्थान (पंडित जी के घर) लौटकर श्राद्ध करना चाहिए। बाद में पिंडों को लेकर अक्षय वट वृक्ष के पास पित्रुओं का तर्पण करके पिंडदान देना चाहिए। यह सब अन्न-पान के बिना करना चाहिए। गया में अक्षय वट वृक्ष का अग्र भाग हम देख सकते हैं। यहीं हम हमारे ( क्रोध, जलन, मोह, लोभ , घमंड इत्यादि दुर्गुणों को विसर्जन करना चाहिए। इसके प्रतीक के रूप में एक फल, एक तरकारी और एक पत्र (बरगद) को जीवन भर में कभी भी इस्तेमाल न करने की शपथ लेते हैं।

इसके बाद काशी वापस आकर वहां दंपति पूजा और समाराधना करना है।

फिर से रामेश्वर तक रवाना हो कर वहां रामनाथस्वामी को प्रयागराज से लिए गए गंगाजल से अभिषेक करना है। घर लौटकर गंगाजल की पूजा करने से यह काशी यात्रा समाप्त होती है।

15 thoughts on “काशी यात्रा”

    1. तो तुम बीहार से हो। आजकल तुम्हारे स्थान सुतरने लगा है। बेहतर है। हमारे कार ड्राइवर वहां की १० साल पुराने की कहानी सुना रहा था। मैं तो बिल्कुल डर गई थी। पहली बार उत्तर प्रदेश आई हूं। अच्छा लगा। लोग भी अच्छे हैं।

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      1. कुछ नहीं सुधरा है अभी भी वैसा ही है………हमारे पापा-दादाजी का घर बिहार में है वैसे हम लोग झारखंड में रहते है…….मैं अभी तक सिर्फ दो बार ही गया हूँ😅😅
        उत्तर प्रदेश तो पहले से काफी अच्छा हो गया है। योगी आदित्यनाथ जी ने सबको सुधार दिया है😛😛

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  1. प्रयाग आप आई थी हमें बताया भी नहीं यह बहुत अन्याय है आप वैसे भी मातृतुल्य है और आशीर्वाद से पुत्र को वंचित रखा आपने🙏

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    1. चिंता मास्तु। मां का आशीर्वाद जरूर मिलेगा। मेरे और एक फालोयर है, डाॅक्टर निमिष। वो भी प्रयागराज से है। मुझे मां ही बुलाता है। मुझे तुम दोनों की याद आई। लेकिन समय न होने के कारण मिल न सकी।

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