शरणागत।

   कुरुक्षेत्र युद्ध के लिए युद्ध भूमि सिद्ध की जा रही थी। तब वहां के बड़े बड़े वृक्षों को हाथियों के सहारे उखाड़ फेंक रहे थे। और मैदान को ठीक कर रहे थे।

    तब वहां एक पेड़ पर अपनी छोटी सी बच्चियों के साथ रहने वाली एक चिड़िया घोंसले के साथ नीचे गिर गई। उसके बच्चों को पंख न होने के कारण उड़ नहीं सकते थे। वह चारों तरफ अपनी नज़र घुमाई। उसके नजरों में कृष्णार्जुन दिखाई दिए। तुरंत वह उनके रथ के ऊपर उड़कर बैठी और श्री कृष्ण से अपने बच्चों को बचाने के लिए प्रार्थना की। क्यों कि अगले दिन युद्ध शुरू होनेवाला था। श्री कृष्ण ने कहा जो होना है,वह जरूर होगा और इसे कोई  रोक नहीं सकता । चिड़िया ने कहा, “मैं सिर्फ आप पर भरोसा रखीं हूं, यदि हमें जीना है या मरना, मैं आपही के हाथों में सौंप दिया हूं।” कालचक्र घूमता रहता है। यही श्री कृष्ण का जवाब था। अर्जुन को कुछ भी समझ में नहीं आया।

    युद्ध शुरू होने से पहले, श्री कृष्ण, अर्जुन से अपने धनुर्बाण लाने को कहा। अर्जुन को आश्चर्य हुआ, क्योंकि श्री कृष्ण युद्ध में शस्त्रों का प्रयोग न करने की हामी दिए थे। श्री कृष्ण अपने धनुष से एक हाथी को निशाना लगाया, (वही हाथी थी, जो चिड़िया की घोंसले को गिराया था) और ठीक उसके कंठ में बन्धित घंटी को तोड दिया। इस पर अर्जुन को कृष्ण पर हंसी आई और अपने धनुर्विद्या प्रावीण्यता पर गर्व महसूस हुई। उसने श्री कृष्ण से कहा कि वह हाथी को सही निशाना लगाकर मारें। श्री कृष्ण मुस्कुराकर , चिड़िया की घोंसले को गिराने का सजा यही है, कहकर धनुर्बाण को रथ के अंदर रखने को कहा। अर्जुन को कुछ भी समझ में नहीं आईं।

    १८दिन के कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद पांडवों की जीत हुई। श्री कृष्ण और अर्जुन युद्ध भूमि को घेर रहे थे। तब श्री कृष्ण अर्जुन से वहां गिरी हुई घंटी को हटाने को कहा। अर्जुन को आश्चर्य हुआ कि ढेर सारे कामों के बीच में यह घंटी हटाने की बात उसे अनावश्यक लगा। लेकिन जब अर्जुन ने घंटी को उठाया तब उसमें से एक चिड़िया अपने बच्चों के साथ उड़ी। वह श्री कृष्ण को अपने परिवार को बचाने के लिए , धन्यवाद देते हुए अपने पंखों को जोड़कर प्रणाम की।

   अर्जुन तब भगवान श्री कृष्ण से माफी मांगते हुए कहा कि ” हे भगवान श्री कृष्ण, आप मेरे साथ साधारण मानव जीवन बिताने के कारण , मैं आपको हमारे ही तरह देखने लगा। हे परमात्मा, आप सब कुछ ठीक से जानते हैं और यह भी कि, जो आपको पूरी तरह से शरण करते हैं उन्हें बचाने वाले भी आप ही हैं।”

    परित्राणाय साधूनां, विनाशाय च दुष्कृतां।        धर्म संस्थापनार्थाय, संभवामि युगे,युगे।। जय श्री कृष्ण। 🙏🙏

3 thoughts on “शरणागत।”

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: