संतों के दर्शन

   नारद मुनि को एक बार श्री महाविष्णु से अपने मन की बात कहने का अवसर मिला। उन्होंने श्री विष्णु से पूछा कि संतों के दर्शन का प्रभाव क्या हो सकता है। महाविष्णु ने नारद से पृथ्वी की ओर संकेत करते हुए , वहां जंगल में एक छोटी सी कीड़े की जन्म हुई है, जाकर उससे पूछने को कहा।

   नारदजी भी उस कीड़े से संतों के दर्शन करने का नतीज़ा के बारे में पूछा। जब कीड़े ने नारदजी को देखकर अपनी मुंह खोली तुरंत उसकी मृत्यु हो गई। नारदजी परेशान से विष्णु से इस संगठन के बारे में चिंतित हो कर कहा। अब विष्णु ने उसी जंगल में एक पेड़ पर एक तोते की अंडे से नवजात शिशु से पूछने को कहा।

    नारदजी फिर से अब तोते की बच्ची से यही प्रश्न की। तोते की बच्ची भी नारदजी को देखकर अपनी मुंह खोली और वह भी तुरंत मर गई। इस बार नारदजी घबरा गये और विष्णु से अपने साथ ऐसे मत खेलने को कहा। लेकिन इस बार एक ब्राह्मण के घर की गाय एक बछड़े को जन्म दिया है और उससे पूछने को कहा। नारदजी साफ इन्कार करते हुए गो हत्या पाप अपने ऊपर पड़ने की चिंता व्यक्त की। फिर भी विष्णु ने गाय की बछिया से पूछने को कहा।

नारदजी कुछ घबराहट से ही बछिया से संतों के दर्शन करने से होने वाली नतीजे के बारे में पूछा। जब बछिया ने अपनी मुंह खोली तुरंत वह भी मर गई।

नारदजी क्रोध और परेशान हो गए। उन्होंने विष्णु , अपने प्रश्न को उत्तर देने के बजाय हर बार किसी नवजात शिशु के पास भेजकर उनसे प्रश्न करना और इस कारण उनके मृत्यु होना देखकर दुःखी हो गये। इसी को उन्होंने विष्णु से व्यक्त किये।

विष्णु मुस्कुराते हुए इस बार काशी महाराज को क‌‌‌ ई सालों के बाद एक संतान हुई है और उस लड़के से पूछने को कहा। नारदजी ने इन्कार करते हुए कहा, कि,” इस बार कोई दुर्घटना हुई तो अपने ही जान की खतरा हो सकती है इसलिए मैं जाने के लिए तैयार नहीं हूं। “फिर भी विष्णु ने उसे समझाया और जाकर राजकुमार से प्रश्न करने को कहा।

नारदजी को देखकर काशी महाराज बहुत ही खुश हो गये। नारदजी के अतिथि सत्कार बेहतरीन तरीके से किये। नारदजी अपने अंदर की डर को छुपाकर धीरे से शिशु राजकुमार से अपने मन की प्रश्न पूछे। और अपने आंखों को बंद कर लिए। तब वहां खूब हंसने की आवाज़ सुनाई दी। आश्चर्य से नारदजी देखें तो उसे देखकर बालक ने कहा कि, “आप जैसे संतों की दर्शन के कारण ही मैं कीड़े से चिड़िया , और चिड़िया से गाय और अब राजकुमार हुआ हूं। आपके दर्शन के कारण जल्दी से जल्दी ही मैं इस उत्तम जन्म को पाया हूं।”। इस पर नारद मुनि बेहद संतुष्ट हो ग्ए और श्री महाविष्णु को अपनी धन्यवाद देते हुए देवलोक लौट गए।

6 thoughts on “संतों के दर्शन”

  1. तीर्थ नहाय एक फल,
    संत मिले फल चार
    सद्गुरु मिले अनंत फल
    कहे कबीर बिचार

    अद्भुत कहानी है💕🤗

    Liked by 3 people

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: