ख्वाहिश

कभी कभी मुझे लगता है कि मैं फिर से अपने बीते हुए दिनों से गुजरना चाहती हूं। किसी चीज को बदलने के लिए नहीं लेकिन फिर से अनुभव करने के लिए।

फिर से छोटी बच्ची होकर मां के गोद में लेटकर उसकी मुस्कान देखना चाहती हूं। फिर एक बार अपनी स्कूल जाना चाहती हूं। पढ़ने नहीं लेकिन अपने साथियों से छात्रावस्था के दिनों में रहने के लिए, जिन्हें मैं स्कूल दिनों के बाद कभी नहीं मिली। कालेज फिर से जाना है, सिर्फ अपने पढ़ाई को और एक बार खूब समझने के लिए।

दिल चाहता है पहले काम करने के क्षेत्र में फिर एक बार नवसिखुआ होना चाहती हूं, कामचोर होने नहीं बल्कि पहली तनख्वाह को हाथों में लेने की अनुभव के लिए।

फिर से शादी करना चाहती हूं। पार्टनर को बदलने नहीं लेकिन शादी की खुशियां धूमधाम से फिर एक बार मनाने के लिए। यदि मेरे बच्चे फिर से छोटे हों जाएं, इसलिए नहीं कि वे बढ़ रहे हैं, मैं इस बार उनके साथ खूब खेलने के लिए। मेरी उम्र लंबी होने की आशा करती हूं, ज्यादा दिन रहने नहीं लेकिन यदि मैं किसी का सहारा बन सकूं।

13 thoughts on “ख्वाहिश”

  1. आपकी रचना पढ़कर अचानक कुछ विचार मन में आया—ऐसा होता तो कैसा होता। और एक रचनाबन गई। सबसे पहले आपको प्रस्तुत है शायद आपको पसंद आए।

    ख्वाहिश

    ना होती विस्मृत यादें और पल गुजरे वापस आ आते,
    काश कि हम बच्चे बन जाते,काश कि हम बच्चे बन जाते।
    है ख्वाहिश फिर से पढ़ने की,
    यारों संग मस्ती करने की,
    था नही बदलना कुछ विशेष,
    करते जो छूट गया है शेष,
    नाना,नानी का सत्य स्नेह,
    पाते पापा का वही प्रेम,
    माँ का फिर से पाते ममत्व,
    जो बोधहीन समझे ना तत्व,
    फिर रूठते हमें मनाती माँ,
    हँसने से हमें मुस्काती माँ,
    हम जिसे रुलाए कल अबोध,उसको सुकून दे पाते,
    काश कि हम बच्चे बन जाते,काश कि हम बच्चे बन जाते।
    ख्वाहिश कुछ और ना करने की,
    हमसफ़र को नही बदलने की,
    फिर यही हमारा पूत होता,
    सोचो कैसा तब सुख होता,
    कुछ नही बदलना दशा,हाल,
    कायम रखना है शर्म,लाज,
    माना गर ऐसा हो जाए,
    हमसब गर बच्चे हो जाएं,
    आ जाए फिर से वही वक़्त,
    चिट्ठी पत्री का पुनः चक्र,
    तुम दूर कहीं,हम दूर कहीं,
    मिल पाने से मजबूर कहीं,
    फिर से अपनी शादी होगी,
    जो हुआ कभी क्या तब होगी,
    हम तुम बिन क्या जी पाएंगे,
    यादों से निकल क्या पाएंगे,
    खो जाएंगे सब मीत,सखा,
    जो मिले हैं कम सौभाग्य है क्या?
    तब और अधिक गम पाएंगे,
    जब हम बच्चे बन जाएंगे,
    ना,नही पुनः बच्चा बनना,
    हूँ जैसा वैसा ही रहना,
    जो शेष बचे पल जीवन के,
    उस पल का लुत्फ उठाएंगे,
    जो जिया नही है जीवन में,
    वो औरों को दे जाएंगे,
    है नही गिला इस जीवन से,ना ख्वाब हृदय में लाते,
    काश कि हम बच्चे बन जाते,काश कि हम बच्चे बन जाते।
    !!!मधुसूदन!!!

    Liked by 1 person

    1. वाह!!वाह!!
      आप पर माता सरस्वती देवी की कृपा है। इतने सुन्दर तरीके से और आसानी से आप रचना करते हैं। मैं आपके प्रतिभा की नमन करती हूं। 🙏👏👏👏👏🙏🎉

      Liked by 1 person

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