चिदंबरम का रहस्य।

लगभग 8 वर्ष की अनुसंधान के बाद पश्चिम देशी वैज्ञानिकों ने आखिर यह बात मान लिए कि चिदंबरम के नटराज के पैर की अंगुली ही इस धरती की चुंबकीय भूमध्य रेखा है।

इस विषय को हमारे प्राचीन विद्वान श्री तिरुमूलर ने 5,000 वर्ष पहले ही साबित कर चुके थे।

इनके द्वारा रचित निबंध *तिरुमंत्रम* हमारे लिए एक वैज्ञानिक मार्गदर्शक के रूप में प्रचलित है। इसे पढकर समझने में हमें 100 वर्ष की आयु की जरूरत होती है।

चिदंबरम मंदिर के विशेषताएँ :-

1) यह मंदिर हमारे इस दुनिया के भूमध्य रेखा पर स्थित है।

2) पंचभूतों में चिदंबरम का स्थान है आकाश का। कालहस्ती का वायु स्थान और कांचीपुरम के एकांबरेश्वर का स्थान भूमि स्थल। ये तीनों मंदिर एक ही सीधी रेखा पर स्थित है, 79 डिग्री और 41मिनट की देशांतर में। यह तो सचमुच अंतरिक्षीय चमत्कार है।

3) चिदंबरम मंदिर हमारे मानव शरीर का सूचक का प्रतीक है। इस मंदिर के 9 द्वार हमारे शरीर के 9 द्वारों को सूचित करता है।

4) इस मंदिर के छत पर लगीहुई 21,600 सोने के चादर मनुष्य के प्रति दिन लेने वाले 21,600 श्वास को संबोधित करते हैं। (15*60*24) =21,600

5) 21,600 चादर 72,000 कीलों से जुड़े हैं, जो हमारे बदन के नाडी के सूचक हैं। नडी वो होती है, जो पूरे शरीर को शक्ति फैलाती हैं।

6) तिरुमूलर का कहना है, मानव के शरीर शिव लिंग और चिदंबरम के सदाशिव का वर्णनात्मक है।

7) पोन्नंबलम् थोड़ा बायें की तरफ झुकी हुई है, जिसका तुलना होता है हमारे दिल से। यहाँ तक पहूँचने, 5 सीढियों पर चढना चाहिए। 5 सीढियाँ शिव पंचाक्षरी को संबोधित करते हैं। “शि वा य न मः “।

8) 28 स्थंभ , 28 तरह के शिव पूजा विधान को सूचित करते हैं। इनहें 64 शहतीर जोडते हैं, जिनको हमारे 64 कलाओं से संबंधित की गई है।

कनकसभा 4 स्थंभों पर आधारित है। ये चार स्थंभ, चार वेदों का सूचना देते हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।

9) स्वर्ण छत पर स्थापित नवकलश नवशक्तियों को संबोधित करते हैं।

अर्धमंटप के छः स्थंभ, छः शास्त्रों के सूचक हैं।

इसके निकट ही स्थित 18 स्थंभ 18 पुराणों को सूचित करते हैं।

10) पश्चिमी वैज्ञानिकों ने नटराज के नृत्य को *ब्रम्हाण्ड नृत्य * कहकर विस्मित हो रहे हैं।

आजकल के विज्ञान जिस विषय को नये खोज का रूप दे रहा है, उसीको हजारों साल पहले ही सनातन धर्म ने साबित कर दिया है।

ऊँ नमः शिवाय। 🙏

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आत्मविश्वास

अर्जन्टीना से बार्न स्वालो नामक एक छोटीसी पक्षी मिथुन केलिए वहाँ से हर फरवरी मास लगभग 8300 कि.मी. रवाना होकर मार्च महीने के अंत में अमेरिका के कालिफोर्निया तक पहुँचती है। वहाँ के केपिस्ट्रानो देवालय में टिकाना लगाकर वंश वृद्धि करती है और नवजातों के साथ अक्तूबर में फिर से 8300कि.मी. पार करके अर्जन्टीना वापस आती है।

इसमें आश्चर्य क्या हो सकता है? बात यह है कि उसके पूरे इतनी दूर की सफर में कहीं भी जमीन या पहाड़ का नजर तक नहीं है। सिर्फ समुद्र के ऊपर का यान। यदि रास्ते में थकावट के कारण आराम करने या तो भूख मिटाने के लिए रूकेगी कहाँ? इसलिए वह अपने यान के शुरू से ही अपने साथ एक छोटी सी लकडी के टुकड़े को चोंच में दबाकर उडना शुरू करती।रवाने के बीच में जब भी आराम करती, समुद्र के निकट उडती हुई मछलियों को ढूंढते ढूंढते उस लकडी को लहरों पर डाल कर इसी के ऊपर बैठकर आराम करती।

16,600 दूर तक की यान केवल एक छोटी सी लकडी की सहारा से हो सकती तो, कयी सुविधाओं और इनके साथ दीमाग को लेकर हमें अपने जीवन में आगे बढ़ने के लिए कौन सी मुसीबत रोक सकती??

रेल यात्रा

हमारे जन्म के साथ ही हमारे जीवन की रेलयात्रा भी शुरू हो जाती है। हमारे पहले साथी होंगे हमारे माँ-बाप। हमें इस बात पर उम्मीद रहेगा कि वे सदा के लिए हमारे ही साथ देंगे।

समय के साथ इस यात्रा में और कुछ लोगों के चढाई और उतराई भी होता रहेगा। जैसे कि, हमारे दोस्तों, हमारे प्यार, बाद में बीवी,बच्चे आदि।

ऐसे ही गुजरती हुई इस यात्रा में अनिवार्य अवसर पर हमारे माँ-बाप हमें अकेले में छोड़कर गुजर जाते हैं। वैसे ही औरों भी अपने अपने मँजिलों पर उतरकर हमें ऐसी एक रिक्त स्थान को महसूस कराते हैं।

इस सफर में सुख,दुख,इंतजार, स्वागत, बिदाई सब शामिल होते हैं। प्रायः हमारा कर्तव्य यह होगा कि सभी यात्रियों के साथ बेहतर रिश्ता रखने का।

गुप्त विषय यह है कि हमारे मँजिल कब और कहाँ, जहाँ हमें भी उतरना पडें।इसलिए हम इस पर्यटन में प्यार और क्षमा जैसे सद्भावनाओं का अनुसरण करें, ताकि जब हमें उतरना पडें तब साथी पर्यटकों को हमारे प्यार भरे रिश्ते की यादगार छोड़ कर जाएँ।

दृष्टिकोण

समुद्र के किनारे पर खेलते हुए एक लडके के जूते लहरों के साथ समुद्र के अंदर डूब गई। लडके ने गुस्से से तट पर लिखा “यह समुद्र एक चोर है।”

कुछ ही दूर पर एक मछुआरे को अनगिनत मछलियाँ मिलने पर उसने लिखा “यह समुंदर एक बडा ही दाता है।”

उसी सागर में एक तैराक तैरते हुए डूब गया। उसकी माँ बेटे को खोकर रोते हुए इसी सागर को सबको मारकर खानेवाले राक्षस से तुलना की।

उस जलधि में एक बूढ़े को ढेर सारे मोतियाँ मिली। वह प्रसन्न होकर लिखा “मेरे लिए चैन से जीने के लिए यह सागर काफी है।”

इतने में एक बडी लहर आकर सबके लिखावट को रगड़ दी।

इस दुनिया में हर एक का दृष्टिकोण और हालत अलग-अलग होता है। इसका मूल्यांकन करना नामुमकिन है।

आर्जित सेवा। 🙏

तिरुपति के बालाजी के मंदिर में हर दिन प्रातःकाल से रात तक की कयी तरह की सेवाएँ की जाती हैं। लेकिन इनमें से खास कर “अष्टदल पाद पद्माराधना” प्रमुख है।

आँध्रप्रदेश के गुन्टूर नगर से शेक मस्तान नामक एक मुसलमान पादयात्रा करके तिरुपति पहूँचा। वहाँ उसने अर्चकों से एक खास विनती की। अर्चकों ने उसे देवस्थान के इ.ओ. के पास ले गए।

शेक मस्तान उनसे कहा कि, अपने घर के वंशज कयी सालों से बालाजी के भक्त हैं। दादाजी के समय से उन्होंने भगवान को समर्पण करने के लिए स्वर्ण कमलों का संग्रहण करना शुरू की। हर एक कमल का वजन 24ग्राम का है। और अपने घर में बालाजी के तस्वीर के सामने प्रति दिन वेंकटेश्वर सुप्रभातम्, मंगलाशासनम् गाया जाता है।

अबकी बात यह है कि, दादाजी के काल से शुरू हुई 108 स्वर्णकमलों का संग्रहण अभी अपने काल में ही पूरी हुई है। इसलिए उसने इ.ओ. से इन स्वर्णकमलों को स्वीकार करके अपने परिवार की इच्छा को पूरा करने की विनती की। इस बात पर वहाँ मौजूद हुए सबके दिलों में आश्चर्य के साथ रोमांचक भावभी फूल उठी।

तुरंत इ.ओ. ने अपने कुर्सी से उठकर मस्तान से दोनों हाथ मिलाकर उसकी आशा को पूरी करने में अपनी तरफ से कृतज्ञता के साथ पूरी सहमति दी।

आजतक हर मंगलवार बालाजी को शेक मस्तान के परिवार द्वारा दी गई स्वर्णकमलों से आराधना की जा रही है।

मतों को पारकर भक्ति का एक बेहतर मिसाल है यह संघटन। 🙏👑

समर्पण

श्री कृष्ण हर दिन बगीचे में जाकर पौधों से अपने प्यार को प्रकट करता था और पौधे भी खुशी से अपने अपने प्यार को व्यक्त करते थे।

ऐसे ही एक दिन श्री कृष्ण बडी ही हैरानी से उपवन आया और बांस के पेड़ के पास आकर रूक गया।बांस के पेड़ ने श्री कृष्ण से पूछा कि “क्या बात है कृष्ण, कुछ परेशान लगते हो?”

कृष्ण ने कहा, ” मुश्किल की बात है, इसलिए तुमसे पूछने में मुझे हैरानी हो रहा है।”

बांस ने कहा, “परवाह नहीं बता दो न, यदि मैं तेरी काम में आऊँ तो मेरे लिए वह सौभाग्य की बात है।”

कृष्ण का कहना है कि यह बांस का जानलेवा का विषय है। इसपर कुछ देर तक बांस ने सोचा और श्री कृष्ण से अपने जान देने के लिए अपना पूरा सहमति दे दी।

तभी कृष्ण ने बांस को काटा और इसमेँ सुराख करते वक्त बांस को बहुत ही दर्द हुई, लेकिन बांस ने अपनी बाधा को सह ली। अंत में श्री कृष्ण को गाने के लिए एक बांसुरी मिल ही गई।

पूरा दिन बांसुरी कृष्ण के साथ ही होता था, इस पर गोपियों को बडी ही जलन हो रही थी। उन्होंने बांसुरी से पूछी कि “हम तो कृष्ण के साथ बहुत कम समय ही होती, किंतु तुम तो पूरा दिन कृष्ण के साथ ही होते हो? क्या राज है. हमें भी जरा बताओ न।”

बांसुरी ने आराम से उत्तर दिया, “मैं अपने आप को कृष्ण के हाथों में सौंप दिया। मेरे लिए जो कुछ भी सही है, उसी तरह कृष्ण ने मुझे मोड दिया। जिसका परिणाम ऐसा हुआ कि अब मैं उसके साथ सदा के लिए सुंदरं बांसुरी की रूप में रहूँ। वो अपने इच्छानुसार मुझमें गीत बजाता रहे। ”

यही होती है समर्पण। कभी भी हम इस बात को ध्यान में रखें कि भगवान पर पूरा यकीन करके सच्चे दिल से उन्हें अपने आप को सौंप दें और निश्चिंत रहें। हमें जो भी सही होगा सही समय पर भगवान हमें वो जरूर देगा।

धर्म

महाभारत में कर्ण ने श्रीकृष्ण से पूछा कि,

मेरी माँ ने मुझे जन्म देते ही , अनौरस हालत में छोड़ दिया।

गुरु द्रोणाचार्य ने मुझे शिक्षा देने से मना किया सिर्फ इसलिए कि मैं क्षत्रिय नहीं माना गया।

आचार्य परशुराम ने भी मुझे शिक्षा तो दिया लेकिन इसके साथ ही मेरा जन्म रहस्य को जानकर मेरी जरुरती के समय पर सब कुछ भूलजाने की शाप भी तो दे दिया।

एक गाय अकस्मात मेरे अनजाने में अपने तीर की बलि होने पर उसकी मालिक ने मुझे ही इसका कारण कहकर शाप दी।

द्रौपदी के स्वयंवर के अवसर पर मुझे इसमें भाग लेने से धिक्कार किया गया।

आखिर मेरी माँ केवल अपने पंच पांडवों को बचाने के लिए मुझसे वचन लेने के लिए ही सच्चाई बोलने की हिम्मत की, वह भी अकेले में।

इन सबके बगैर दुर्योधन ने मुझे सम्मान की और एक अच्छी दोस्त की भूमिका निभाई। इसलिए कुरुक्षेत्र संग्राम में मेरा उसका पक्ष लेना कैसे गलत हो सकता है???

इन सब बातों को सुनने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने कहा,

मेरे जन्म तो हुई जेल में। मेरे जन्म से पहले ही मौत मेरी इंतजार कर रही थी। मैं जन्म लेते ही अपने माता पिता से छुडवा गया।

तुम्हारा बचपन तो तलवार, तीर, रथ,घोड़े,सैनिकों के बीच में चली। लेकिन मुझे तो गोशाला में गायों के साथ रहना पडा। मैं तो चलना शुरू करने से पहले ही मुझपर कई तरह की हमले हुए।

बालाभ्यास मिलने के समय पर मुझे शिक्षा नहीं मिला जबकि लोग हर बात पर मुझे ही दोष दे रहे थे। मैं तो गुरु संदीपनी के यहाँ 16 वर्ष के उम्र में ही विद्याभ्यास आरंभ किया।

तुम अपने मन चाहे औरत से विवाह किया। लेकिन मैं ने जिससे प्यार की वह मुझे नहीं मिली और मैं ने जिन्हें बचाया उन्हीं से शादी करना पडा।

मैं तो अपने वालों को जरासंध से बचाने के लिए यमुनातीर से बहुत दूर समुंदर के किनारे पर उन्हें बसाना पडा, जिसके कारण मुझे कायर का पद मिला।

यदि दुर्योधन युद्ध में जीतेगा तो तुझे ज्यादा ही लाभ होगा। किन्तु धर्मराज युधिष्ठिर जीतने से मुझे क्या मिलेगा। सिर्फ युद्ध का इलजाम।

एक विषय ध्यान में रखना, हर किसी व्यक्ति को जीवन में अलग अलग तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

जीवन तो इतना आसान और सुखद कभी नहीं हो सकता। कठिनाइयों का सामना करने के कारण यदि हम बुरे रास्ते को चुनें तो वह सही नहीं होगा।

हमारे मंजिल हमारे जूते तय नहीं करते, बल्कि हम किस तरफ अपने कदमों को आगे बढाते, वही तय करते।