अयोध्या पट्टणम्।

तमिलनाडु के सेलम् जिले से 11कि.मी. की दूरी पर स्थित एक सुंदर मंदिर है, अयोध्या पट्टणम्। तमिल भाषा में पट्टणम् का मतलब है, शहर। कहा जाता है कि, भगवान श्री राम लंका युद्ध के बाद, सीता माता, लक्ष्मण, सुग्रीव,हनुमान तथा विभीषण के साथ पुष्पक विमान में अयोध्या लौटते हुए जब इस जगह के ऊपर से पार कर रहे थे, तब यहाँ पर भरद्वाज मुनि का आश्रम था। उनके अनुरोध पर श्री राम जी वहाँ एक दिन के लिए ठहरे। भरद्वाज मुनि श्री राम जी से अपने को अयोध्या जाने के बाद उनके साथ होने वाले पट्टाभिषेक को देखने के लिए अपने ह्रदय की इच्छा को प्रकट की। श्री राम भी इसे स्वीकार कर के सीतामाता के साथ एक पत्थर पर बैठकर पट्टाभिषिक्त मुद्रा में दर्शन दिए। तब दोनों ओर लक्ष्मण, हनुमान, सुग्रीव तथा विभीषण खडे होकर उनको प्रणाम किए। साथ ही भरद्वाज मुनि भी।

हजारों सालों तक यह जगह जंगल के अंदर अदृश्य था। 16 वीं सदी में यहाँ पर लोग आकर बसने लगे। जंगल को हठाने के बाद लोग वहाँ पर मौजूद श्री राम को देखकर मदुरै नगर के साम्राट तिरुमलै नायकर से यहाँ पर मंदिर बनाने की अनुरोध किए।

साम्राट के आज्ञानुसार वहाँ एक बहुत ही सुंदर मंदिर की स्थापना हुई। इस शिल्पकला का वर्णन बातों में करना तो नामुमकिन है।

इस ब्लॉग के साथ कुछ तस्वीरें भी पोस्ट की हूँ।

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रोशनी का शिकार

हम सब जानते ही हैं कि सूरजमुखी सूर्य की दिशा में ही अपने को घुमाती है। दूसरे शब्दों में मानें”रोशनी का शिकार” करती है। लेकिन बरसात के मौसम में जब बादलों के छाया में सूरज छिप जाता तो ये फूल क्या करते हैं?🤔

शायद यही हो सकता है कि सूरजमुखी फूल अपनी पत्तों को गिराकर नीचे झुकी होगी। लेकिन यह बिलकुल गलत है। वे फूल एक दूसरे की तरफ मुडकर अपनी ऊर्जा को आपस में बाँटकर खिल उठती हैं। कुदरत की संतुलन अनोखी होती है।

अब हमें भी इसी तरह की रोशनी हर एक की जीवन में आवश्यक होता है। जैसे कि परिवार में, दोस्तों में या तो कामों में।सीधे चलते हुए जीवन में कभी कभी बादलों की छाया की तरह कुछ व्याकुलता फैलना भी अनिवार्य है। ऐसी स्थिति में ज्यादातर लोग घबरा जाते हैं न तो तनाव में पड जाते हैं। हम क्यों न सूरजमुखी का अनुकरण करें??😎

प्रकृति एक बहतरीन आचार्य है जिसमें हर एक मुसीबत का समाधान हमें मिलता है। तो क्यों न हम अपनों के लिए संकटों में सूरजमुखी बनें???

बुढापा

बुढापा+अकेलापन=परेशानी

बेटा….बेटी…. को पालपोसकर , पढाकर, शादी करवाकर……ऐसे ही जीवन में साथ ही साथ 60-70साल बीत भी जाती है।

कहीं दूर शहर में या तो अन्य राज्य या देश में काम के तौर पर रहना पडता हैं इनके औलाद को।

यहाँ अपने ही घर में इस बुढापे में जहाँ परिवार के सदस्यों के साथ रहा करते थे, वहीं सिर्फ और सिर्फ अकेलापन। एक अनाथ की तरह।

बच्चों के यादगार दिलाने वाली घटनाओं को बार बार याद करते हुए ” यहीं पर मेरी बेटी बैठकर पढाई करती,…… क्रिकेट खेलते हुए इस खिडकी के शीशे को बेटे ने कैसे तोडा……ऐसे ही ढेर सारे स्मृतियों में अपने आप को खो जाते हैं।

पकाने या खाने में थोड़ी सी भी दिलचस्प नहीं होती।इस उम्र में खाने में भी ज्यादा ही प्रतिबंधनाएँ।

बच्चों के पास जाना चाहें तो घर से निकलकर स्टेशन तक पहूँचना ही बडी चुनौती लगती है। Ola/Uber भी ठीक समय पर दुगुना वसूल करलेते हैं।। एक ही कदम में चार सीढियों को पार कर पानेवाले नौजवान इस वृद्धाप में हर एक कदम पर किसी की सहारा लेने की परेशानी।

रवाना का विचार छोड़कर वाट्सअप में विडियोकाल करना चाहें , फिर भी इसमें कुछ न कुछ झंझट। जैसे कि बच्चे लोग अपने परिवार के साथ कहीं घूमने निकल जाते या तो उनके शाम का समय यहाँ हमारे आधीरात का टैम हो जाता। इस उम्र में तो नींद आना भी बडी ही मुश्किल की बात है।

पोता-पोती को देखकर बात करना चाहें तो वो भी सिर्फ उनके तीन साल की उम्र तक। बाद में वे भी बिस्सी हो जाते। जब भी पूछें , जवाब मिलता है, ” खेलने गया है, ट्यूशन गया है, योगा क्लास गया है, कम्प्यूटर क्लास गया है या तो दोस्त से मिलने गया है।”

उन्हें देखना तो अजीब की बात है, फिर भी एक बार हाय कहकर गायब हो जाते हैं। हमारे रीति रिवाज, रिश्ता सबको टेक्नोलॉजी ने खालिया है।

वाट्सएप में बच्चों के स्टेटस ही इन बूढों के सांस होकर इन्हें जीवित रखी है।

यदि कोई इनसे पूछें कि ” कैसे हैं,” तुरंत जवाब मिलता है, “मुझे क्या ? मैं तो बिलकुल ठीक हूँ।”ये बातें तो बच्चों पर होनेवाली प्यार की समर्थन के सिवा और क्या हो सकता है??