बुढापा

बुढापा+अकेलापन=परेशानी

बेटा….बेटी…. को पालपोसकर , पढाकर, शादी करवाकर……ऐसे ही जीवन में साथ ही साथ 60-70साल बीत भी जाती है।

कहीं दूर शहर में या तो अन्य राज्य या देश में काम के तौर पर रहना पडता हैं इनके औलाद को।

यहाँ अपने ही घर में इस बुढापे में जहाँ परिवार के सदस्यों के साथ रहा करते थे, वहीं सिर्फ और सिर्फ अकेलापन। एक अनाथ की तरह।

बच्चों के यादगार दिलाने वाली घटनाओं को बार बार याद करते हुए ” यहीं पर मेरी बेटी बैठकर पढाई करती,…… क्रिकेट खेलते हुए इस खिडकी के शीशे को बेटे ने कैसे तोडा……ऐसे ही ढेर सारे स्मृतियों में अपने आप को खो जाते हैं।

पकाने या खाने में थोड़ी सी भी दिलचस्प नहीं होती।इस उम्र में खाने में भी ज्यादा ही प्रतिबंधनाएँ।

बच्चों के पास जाना चाहें तो घर से निकलकर स्टेशन तक पहूँचना ही बडी चुनौती लगती है। Ola/Uber भी ठीक समय पर दुगुना वसूल करलेते हैं।। एक ही कदम में चार सीढियों को पार कर पानेवाले नौजवान इस वृद्धाप में हर एक कदम पर किसी की सहारा लेने की परेशानी।

रवाना का विचार छोड़कर वाट्सअप में विडियोकाल करना चाहें , फिर भी इसमें कुछ न कुछ झंझट। जैसे कि बच्चे लोग अपने परिवार के साथ कहीं घूमने निकल जाते या तो उनके शाम का समय यहाँ हमारे आधीरात का टैम हो जाता। इस उम्र में तो नींद आना भी बडी ही मुश्किल की बात है।

पोता-पोती को देखकर बात करना चाहें तो वो भी सिर्फ उनके तीन साल की उम्र तक। बाद में वे भी बिस्सी हो जाते। जब भी पूछें , जवाब मिलता है, ” खेलने गया है, ट्यूशन गया है, योगा क्लास गया है, कम्प्यूटर क्लास गया है या तो दोस्त से मिलने गया है।”

उन्हें देखना तो अजीब की बात है, फिर भी एक बार हाय कहकर गायब हो जाते हैं। हमारे रीति रिवाज, रिश्ता सबको टेक्नोलॉजी ने खालिया है।

वाट्सएप में बच्चों के स्टेटस ही इन बूढों के सांस होकर इन्हें जीवित रखी है।

यदि कोई इनसे पूछें कि ” कैसे हैं,” तुरंत जवाब मिलता है, “मुझे क्या ? मैं तो बिलकुल ठीक हूँ।”ये बातें तो बच्चों पर होनेवाली प्यार की समर्थन के सिवा और क्या हो सकता है??

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वल्ललार्(ज्ञानी)

उनके प्रवचनों से

* भूखे रहो। भगवान की कृपा पाने के लिए भूखे रहना।

* अलग रहो।। अकेलेपन में अपने मन की शांति को ढूंढना।

* जागे रहो।। भगवान के दया को प्राप्त करने के लिए जागे रहना।

* सबके दिलों में भगवान के दर्शन करना ही सच्ची भक्ति माना जाता है।

* प्यार, ज्ञान और भक्ति जिसके पास मौजूद है, वह ही अपने आप उन्नति प्राप्त करता है।

* उत्तम मानव के दिल में ईश्वर प्रणव ज्योति के रूप में बसता है।

* सबको त्याग किए हुए मनुष्य ईश्वर का स्वरूप माना जाता है। इसलिए उसे अपने कल्पना में सीमित करना असंभव है।

* सुख दुःख का अनुभव इस भौतिक शरीर द्वारा आत्मा महसूस करती है।

* सब कुछ ईश्वर का चमत्कार मानें तो किसी भी तरह की परेशानी नहीं होगी।

* योगध्यान द्वारा ही हम ईश्वर को जान सकते हैं। अतः ध्यान करना दैनिक जीवन का अनिवार्य अंग होना चाहिए।

* मानव जीवन में परोपकार द्वारा ही सार्थकता मिलता है।

* कपटी लोगों से सदा के लिए दूर रहना चाहिए।

* हर एक मनुष्य को किसी एक दिन इस शरीर को त्याग करके जाना पड़ता है तो किस लिए इस प्रकार के जाति, धर्म, आर्थिक स्थिति में भेद भाव??

* घमंडी रूपी भूत दीमाग में चढ गई तो दिल में उपस्थित ईश्वर रूपी बुद्धि को नहीं पहचान सकते।

* मित्रों के साथ कभी भी कपट दिल से व्यवहार नहीं करना चाहिए।

* 👆

अरुलप्रकाशं वल्ललार् चिदंबरम् रामलिंगम् , का जन्म 5,अक्टूबर, 1823 में चिदंबरम में हुआ। वे तमिलनाडु में ज्ञानी के रूप में सबसे माने गए हैं। वे ईश्वर को ज्योति के रूप में महसूस किए हैं। आज भी कई लोग उनके द्वारा निर्धारित राह को अपने जीवन में अनुकरण कर रहे हैं।उनके गायन तिरुअरूलपा नाम से प्रसिद्ध है।

मार्ग दर्शन


मेरी इस जीवन सफर में लगभग 48 साल के बाद मिली हुई एक अनोखी हीरा है स्नेहा।।

मेरे देवरजी की बेटी। सिर्फ दो ही महीने तक उसकी साथ रहने की सौभाग्य मुझे मिली। इस जमाने में ऐसी लडकियों को देखना तो नामुमकिन है।उसकी साथ बात करने से हमें इतना जोश मिलता है। सिर्फ 17साल की है, लेकिन ढेर सारे योजनाएँ है उसके पास , इस देश को प्रगति के पथ में ले जाने के लिए। सेलफोन को कैसे उपयुक्त रूप से इस्तेमाल करना है , इसे हर किसी को स्नेहा से ही सीखना है। जब भी आराम लेती है पढाई से, तुरंत चित्र खींचने में बैठ जाती है या तो कर्नाटिक गीत गाती नहीं तो टि.वि. में वैज्ञानिक संबंधित कार्यक्रम देखना शुरू करती।

मुझे अपनी जीवन में ढेर सारे परेशानियों को सामना करना पडा, # हालांकि हर एक के जिंदगी में कुछ न कुछ ऐसी स्थिति होती रहती है।# मेरे साथ देने के लिए जब कोई न था ऐसी स्थिति में इतनी छोटी उम्र में स्नेहा ने मुझे आसानी तरीके से इन मानसिक तनाव से बाहर निकलने की सुझाव दी। जैसे कि मेरी मन चाहे कामों में अपने को जुटे रखना और परपीडकों से कैसे अपने को दूर रखना इत्यादि।

उसी ने मुझे वर्डप्रेस में ब्लाग लिखने के लिए प्रेरणा दी और इसमें मुझे शामिल भी की। नहीं तो मुझे इससे पहले वर्डप्रेस के बारे में कुछ भी पता नहीं था। और आजकल मेरी लेखन में थोड़ी सी तरक्की महसूस कर रही हूँ।

आम लडकियों की तरह अपने को सजाने में उसे बिलकुल दिलचस्पी नहीं है। मामूली सी पोशाक ही पहनती है। इस बार +2 में 493/500मार्क्स मिली। लेकिन वह इस पर थोड़ा सा भी घमंड नहीं दिखाती है। सबसे गर्व की बात तो मेरे लिए यह है कि उसे IIT MADRAS में मेकानिकल विभाग में स्थान मिल गई। किसी भी तरह के संस्था में स्नेहा ने ऐ.ऐ.टि. परीक्षा अभ्यास के लिए नहीं गई। सब कुछ अपने आप इंटरनेट द्वारा अभ्यास की।कर्नाटिक संगीत में भी बि.ए. डिग्री प्राप्त की है।+2में सर्वप्रथम आई है।

ऐसी एक लडकी, इस जमाने में कई विकर्षणों के बीच में से अपने दृढ संकल्प की ओर आगे बढते हुए देख कर मैं भौंचक्का रह जाती हूँ।

स्नेहा की चित्रकला के कुछ नमूने👆

दृढ़ विश्वास

एक मंदिर के प्राकार में एक पंडित जी भगवतगीता का उपदेश कर रहे थे। नगर के ढेर सारे लोग इकट्ठे हुए थे,क्योंकि पंडितजी के प्रवचन दिल को लुभाती है। उसी वक्त वहाँ एक चोर चोरी करने के लिए आसपास के घरों पर नजर लगाते हुए टहल रहा था। वहाँ मंदिर में इकट्ठे हुए भीड़ को देखकर वह भी उन लोगों के साथ प्रवचन सुनने लगा। तब पंडितजी श्रीकृष्ण के बचपन का वर्णन कर रहे थे। वर्णन में श्रीकृष्ण के और माता यशोदा के गहनों का वर्णन ऐसे किए कि इस चोर को मन में ऐसा लगा कि छोटी-मोटी चोरी के बदले में यदि वह श्रीकृष्ण और यशोदा माता पहने हुए गहनों को लूट लिया तो अपना जीवन भर के लिए निशचिंत रह सकेगा।

कुछ देर बाद वह धीरे धीरे पंडितजी के पास जाकर श्रीकृष्ण के वासस्थल के बारे में पूछा जिसका पता यह चला कि श्रीकृष्ण बृंदावन में रहते हैं।वह चोर अनपढ़ था और किसी भी धर्म के बारे में रीति रिवाजों के बारे में कुछ भी नहीं जानता था।

चोर बृंदावन की ओर चलने लगा। और बृंदावन पहूँच भी गया। वहाँ संध्या छाने लगी। चोर एक पेड़ पर छडकर बैठ गया। उसका मन श्रीकृष्ण के बारे में ही सोच रही थी। पंडितजी द्वारा वर्णित श्रीकृष्ण को उसके नजरें ढूंढने लगे।

तभी वहाँ दो छोटे बालक जाते हुए नजर आए। तुरंत चोर उन दोनों के सामने कूद पडा और अपने साथ रखे हुए छूरी से उन्हें धमकाते हुए सारे गहनों को अपने हवाले करने के लिए कहा। दोनों श्रीकृष्ण और बलराम थे। देखने में पंडितजी ने कैसे वर्णन किए थे बिलकुल वैसे ही थे। दोनों बालकों ने चोर से पूछे कि उसे इन दोनों के बारे में किसने बताया तब चोर उन्हें पंडितजी के बारे में जानकारी दी।

दोनों बालक चोर के साथ पंडितजी से मिलने के लिए उस चोर के नगर आ पहूँचे और पंडितजी से चोर धन्यवाद देते हुए बोले कि उस पंडितजी के कारण ही अब उसे जिंदगी भर चैन से जीने के लिए काफी दौलत भी मिल गई। पंडितजी चौंककर उससे सारे वृत्तांत की जानकारी ली। तब चोर पंडितजी से दोनों बालक अपने साथ पंडितजी को देखने को के लिए साथ होने की बात भी कहा। लेकिन पंडितजी श्रीकृष्ण को नहीं देख सके।गदगद होकर मंदिर में मौजूद श्रीकृष्ण के मूर्ति के पास जाकर अपने को किस लिए दर्शन न देने की प्रश्न की।

श्रीकृष्ण की मूर्ति से आवाज निकली चोर अपने को सच में रहने की दृढ़ विश्वास से खोजने के कारण उसे दर्शन दिया। लेकिन पंडितजी तो सिर्फ भगवतगीता का वर्णन ही किए। जो भी अपने को सचमुच मानता है उसे उसी रूप में दर्शन मिलता है।

परपीड़न

जिंदगी में हमें कई तरह के लोगों से मेलन-जोलन होती रहती है। इनमें से सहानुभूति गुणवालों के साथ होने पर हमें बहुत ही चैन मिलती है। लेकिन कभी कभी परपीडकों का भी साथ देना पडता है, जबकि उनके साथ होने से हमें परेशानी और कष्ट के सिवा कुछ नहीं मिलती। यदि ऐसे लोग जीवन साथी हो तो मानें जिंदगी कितना बड़ा ही कष्टदायक हो जाती।

ऐसी हालत में उस गृहिणी के ससुराल के घरवाले उस औरत पर कितना जुल्म बेवजह करते हैं इसे शब्दों में वर्णन करना तो नामुमकिन है। यदि वो लोग इस समाज में “गोमुख व्याघ्रः” के रूप में मौजूद होंगे तो मानें उस औरत की दशा पर किसी को भी यकीन तक नहीं होगी।

हमारे देश में कई ऐसी गृहिणियाँ आज भी सारी ऐसी जुल्मों को बरदाश्त करके जी रही हैं। उन्हें बाहर काम करने के लिए इजाजत नहीं दी जाती। क्योंकि यदि वह औरत कमाने लगेगी तो अपने पैरों पर खडी हो जाती और इन परपीडकों को, अत्याचार करने के लिए मौजूद स्त्री उनके हाथों से छूट जाने की संभावना है। सिर्फ इसीलिए।

मैं तो सिर्फ इस हालत में बदलाव लाने के लिए तरस रही हूँ।