परपीड़न

जिंदगी में हमें कई तरह के लोगों से मेलन-जोलन होती रहती है। इनमें से सहानुभूति गुणवालों के साथ होने पर हमें बहुत ही चैन मिलती है। लेकिन कभी कभी परपीडकों का भी साथ देना पडता है, जबकि उनके साथ होने से हमें परेशानी और कष्ट के सिवा कुछ नहीं मिलती। यदि ऐसे लोग जीवन साथी हो तो मानें जिंदगी कितना बड़ा ही कष्टदायक हो जाती।

ऐसी हालत में उस गृहिणी के ससुराल के घरवाले उस औरत पर कितना जुल्म बेवजह करते हैं इसे शब्दों में वर्णन करना तो नामुमकिन है। यदि वो लोग इस समाज में “गोमुख व्याघ्रः” के रूप में मौजूद होंगे तो मानें उस औरत की दशा पर किसी को भी यकीन तक नहीं होगी।

हमारे देश में कई ऐसी गृहिणियाँ अब भी सारी ऐसी जुल्मों को बरदाश्त करके जी रही हैं। उन्हें बाहर काम करने के लिए इजाजत नहीं दी जाती। क्योंकि यदि वह औरत कमाने लगेगी तो अपने पैरों पर खडी हो जाती और इन परपीडकों को, अत्याचार करने के लिए मौजूद स्त्री उनके हाथों से छूट जाने की संभवता है। सिर्फ इसीलिए।

मैं तो सिर्फ इस हालत में बदलाव लाने के लिए तरस रही हूँ।

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स्वामी

एकबार एक गाय गांव की सीमा पर चरते चरते निकट की जंगल में पहूँच गई। अचानक अपनी सिर उठाकर देखी और चौंक कर कांपने लगी।उसपर हमला करने के लिए एक बाघ उसे गुर्राते हुए देख रहा था। तुरंत गाय अपने को संभालते हुए पास ही मौजूद एक तालाब में कूदी। गाय का पीछे करते हुए साथ ही साथ बाघ भी तालाब में कूदी। वह तालाब कीचड़ से भरा हुआ था। उससे बाहर निकलना दोनों को नामुमकिन सा लगा। फिर भी बाघ गाय को धमकी देते हुए कहा कि वह गाय की हड्डियों को गिने बिना सांस नहीं लेगी। इस बात पर गाय को हँसी आ गई। वह अपनी हालत भूलकर हँसी और बोली। इस स्थिति में होकर धमकी देने से कोई भी फायदा नहीं हो सकता। और भी बोली, गोधूलि के समय अपने को घर में न पाने पर उसका स्वामी उसे ढूंढ कर इस जगह पर पहूँचेगा और अपने को बाहर जरूर निकालेगा। लेकिन बाघ ने इस बात को न माना और गाय की परिस्थिति पर मजाक भी किया।

संध्या आरंभ हुई और गाय का मालिक वहाँ पहूँचा।उसे वहाँ अपनी गाय के साथ बाघ को भी पाकर डर लगी। लेकिन बाघ को कीचड़ में फंसी हुई देख कर चैन से सांस ली। और बडी प्रयास से गाय को कीचड़ से बाहर निकाला।

इस घटना में गाय आत्मसमर्पण को सुझाती। बाघ अहंकार का प्रतीक है। मालिक गुरु का महत्व का याद दिलाता है। कीचड इस संसार में हम प्रतिदिन सामने करनेवाले परेशानियों को याद कराती है।

इस कहानी का सार यही है कि, हमें जरूर आजाद रहना ही चाहिए लेकिन कभी कभी दूसरों का सहारा भी आवश्यक होता है। जैसे कि हमारे दोस्तों का, अध्यापक का, साथी का, पडोसियों का। इसलिए हमें बाघ जैसा अहंकार को त्याग कर गाय की मनोभाव को अपनाना जीवन के परेशानियों से बचने में बेहतर साथ दे सकती है।

चिदंबरम का रहस्य।

लगभग 8 वर्ष की अनुसंधान के बाद पश्चिम देशी वैज्ञानिकों ने आखिर यह बात मान लिए कि चिदंबरम के नटराज के पैर की अंगुली ही इस धरती की चुंबकीय भूमध्य रेखा है।

इस विषय को हमारे प्राचीन विद्वान श्री तिरुमूलर ने 5,000 वर्ष पहले ही साबित कर चुके थे।

इनके द्वारा रचित निबंध *तिरुमंत्रम* हमारे लिए एक वैज्ञानिक मार्गदर्शक के रूप में प्रचलित है। इसे पढकर समझने में हमें 100 वर्ष की आयु की जरूरत होती है।

चिदंबरम मंदिर के विशेषताएँ :-

1) यह मंदिर हमारे इस दुनिया के भूमध्य रेखा पर स्थित है।

2) पंचभूतों में चिदंबरम का स्थान है आकाश का। कालहस्ती का वायु स्थान और कांचीपुरम के एकांबरेश्वर का स्थान भूमि स्थल। ये तीनों मंदिर एक ही सीधी रेखा पर स्थित हैं, 79 डिग्री और 41मिनट की देशांतर में। यह तो सचमुच अंतरिक्षीय चमत्कार है।

3) चिदंबरम मंदिर हमारे मानव शरीर का सूचक का प्रतीक है। इस मंदिर के 9 द्वार हमारे शरीर के 9 द्वारों को सूचित करते हैं।

4) इस मंदिर के छत पर लगीहुई 21,600 सोने के चादर मनुष्य के प्रति दिन लेने वाले 21,600 श्वास को संबोधित करते हैं। (15*60*24) =21,600

5) 21,600 चादर 72,000 कीलों से जुड़े हैं, जो हमारे बदन के नाडी के सूचक हैं। नाडी वो होती है, जो पूरे शरीर को शक्ति फैलाती हैं।

6) तिरुमूलर का कहना है, मानव के शरीर शिव लिंग और चिदंबरम के सदाशिव का वर्णनात्मक है।

7) पोन्नंबलम् थोड़ा बायें की तरफ झुकी हुई है, जिसका तुलना होता है हमारे दिल से। यहाँ तक पहूँचने के लिए 5 सीढियों पर चढना चाहिए। 5 सीढियाँ शिव पंचाक्षरी को संबोधित करते हैं। “शि वा य न मः “।

8) 28 स्थंभ , 28 तरह के शिव पूजा विधान को सूचित करते हैं। इन्हें 64 शहतीर जोडते हैं, जिनको हमारे 64 कलाओं से संबंधित की गई है।

कनकसभा 4 स्थंभों पर आधारित है। ये चार स्थंभ, चार वेदों का सूचना देते हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।

9) स्वर्ण छत पर स्थापित नवकलश नवशक्तियों को संबोधित करते हैं।

अर्धमंटप के छः स्थंभ, छः शास्त्रों के सूचक हैं।

इसके निकट ही स्थित 18 स्थंभ 18 पुराणों को सूचित करते हैं।

10) पश्चिमी वैज्ञानिकों ने नटराज के नृत्य को *ब्रम्हाण्ड नृत्य * कहकर विस्मित हो रहे हैं।

आजकल के विज्ञान जिस विषय को नये खोज का रूप दे रहा है, उसीको हजारों साल पहले ही सनातन धर्म ने साबित कर दिया है।

ऊँ नमः शिवाय। 🙏

आत्मविश्वास

अर्जन्टीना से बार्न स्वालो नामक एक छोटीसी पक्षी मिथुन केलिए वहाँ से हर फरवरी मास लगभग 8300 कि.मी. रवाना होकर मार्च महीने के अंत में अमेरिका के कालिफोर्निया तक पहुँचती है। वहाँ के केपिस्ट्रानो देवालय में टिकाना लगाकर वंश वृद्धि करती है और नवजातों के साथ अक्तूबर में फिर से 8300कि.मी. पार करके अर्जन्टीना वापस आती है।

इसमें आश्चर्य क्या हो सकता है? बात यह है कि उसके पूरे इतनी दूर की सफर में कहीं भी जमीन या पहाड़ का नजर तक नहीं है। सिर्फ समुद्र के ऊपर का यान। यदि रास्ते में थकावट के कारण आराम करने या तो भूख मिटाने के लिए रूकेगी कहाँ? इसलिए वह अपने यान के शुरू से ही अपने साथ एक छोटी सी लकडी के टुकड़े को चोंच में दबाकर उडना शुरू करती।रवाने के बीच में जब भी आराम करती, समुद्र के निकट उडती हुई मछलियों को ढूंढते ढूंढते उस लकडी को लहरों पर डाल कर इसी के ऊपर बैठकर आराम करती।

16,600 दूर तक की यान केवल एक छोटी सी लकडी की सहारा से हो सकती तो, कयी सुविधाओं और इनके साथ दीमाग को लेकर हमें अपने जीवन में आगे बढ़ने के लिए कौन सी मुसीबत रोक सकती??

रेल यात्रा

हमारे जन्म के साथ ही हमारे जीवन की रेलयात्रा भी शुरू हो जाती है। हमारे पहले साथी होंगे हमारे माँ-बाप। हमें इस बात पर उम्मीद रहेगा कि वे सदा के लिए हमारे ही साथ देंगे।

समय के साथ इस यात्रा में और कुछ लोगों के चढाई और उतराई भी होता रहेगा। जैसे कि, हमारे दोस्तों, हमारे प्यार, बाद में बीवी,बच्चे आदि।

ऐसे ही गुजरती हुई इस यात्रा में अनिवार्य अवसर पर हमारे माँ-बाप हमें अकेले में छोड़कर गुजर जाते हैं। वैसे ही औरों भी अपने अपने मँजिलों पर उतरकर हमें ऐसी एक रिक्त स्थान को महसूस कराते हैं।

इस सफर में सुख,दुख,इंतजार, स्वागत, बिदाई सब शामिल होते हैं। प्रायः हमारा कर्तव्य यह होगा कि सभी यात्रियों के साथ बेहतर रिश्ता रखने का।

गुप्त विषय यह है कि हमारे मँजिल कब और कहाँ, जहाँ हमें भी उतरना पडें।इसलिए हम इस पर्यटन में प्यार और क्षमा जैसे सद्भावनाओं का अनुसरण करें, ताकि जब हमें उतरना पडें तब साथी पर्यटकों को हमारे प्यार भरे रिश्ते की यादगार छोड़ कर जाएँ।

दृष्टिकोण

समुद्र के किनारे पर खेलते हुए एक लडके के जूते लहरों के साथ समुद्र के अंदर डूब गई। लडके ने गुस्से से तट पर लिखा “यह समुद्र एक चोर है।”

कुछ ही दूर पर एक मछुआरे को अनगिनत मछलियाँ मिलने पर उसने लिखा “यह समुंदर एक बडा ही दाता है।”

उसी सागर में एक तैराक तैरते हुए डूब गया। उसकी माँ बेटे को खोकर रोते हुए इसी सागर को सबको मारकर खानेवाले राक्षस से तुलना की।

उस जलधि में एक बूढ़े को ढेर सारे मोतियाँ मिली। वह प्रसन्न होकर लिखा “मेरे लिए चैन से जीने के लिए यह सागर काफी है।”

इतने में एक बडी लहर आकर सबके लिखावट को रगड़ दी।

इस दुनिया में हर एक का दृष्टिकोण और हालत अलग-अलग होता है। इसका मूल्यांकन करना नामुमकिन है।

आर्जित सेवा। 🙏

तिरुपति के बालाजी के मंदिर में हर दिन प्रातःकाल से रात तक की कयी तरह की सेवाएँ की जाती हैं। लेकिन इनमें से खास कर “अष्टदल पाद पद्माराधना” प्रमुख है।

आँध्रप्रदेश के गुन्टूर नगर से शेक मस्तान नामक एक मुसलमान पादयात्रा करके तिरुपति पहूँचा। वहाँ उसने अर्चकों से एक खास विनती की। अर्चकों ने उसे देवस्थान के इ.ओ. के पास ले गए।

शेक मस्तान उनसे कहा कि, अपने घर के वंशज कयी सालों से बालाजी के भक्त हैं। दादाजी के समय से उन्होंने भगवान को समर्पण करने के लिए स्वर्ण कमलों का संग्रहण करना शुरू की। हर एक कमल का वजन 24ग्राम का है। और अपने घर में बालाजी के तस्वीर के सामने प्रति दिन वेंकटेश्वर सुप्रभातम्, मंगलाशासनम् गाया जाता है।

अबकी बात यह है कि, दादाजी के काल से शुरू हुई 108 स्वर्णकमलों का संग्रहण अभी अपने काल में ही पूरी हुई है। इसलिए उसने इ.ओ. से इन स्वर्णकमलों को स्वीकार करके अपने परिवार की इच्छा को पूरा करने की विनती की। इस बात पर वहाँ मौजूद हुए सबके दिलों में आश्चर्य के साथ रोमांचक भावभी फूल उठी।

तुरंत इ.ओ. ने अपने कुर्सी से उठकर मस्तान से दोनों हाथ मिलाकर उसकी आशा को पूरी करने में अपनी तरफ से कृतज्ञता के साथ पूरी सहमति दी।

आजतक हर मंगलवार बालाजी को शेक मस्तान के परिवार द्वारा दी गई स्वर्णकमलों से आराधना की जा रही है।

धर्मों को पारकर भक्ति का एक बेहतर मिसाल है यह संघटन। 🙏👑