सोच

सोच बहुत ही शक्तिशाली होती है। सिर्फ एक बार की सोच शक्तिशाली नहीं हो सकती, लेकिन जब एक सोच को बार बार सोचने पर उसका धीरे धीरे कार्यरूप होने का अनुभव मिल सकता है। इसी कारण मंदिरों में लक्षार्चन्, कोटि अर्चना की जाती है।

समान सोचवालों को अपने तरफ आकर्षित करती है। इससे सोच की शक्ति और भी बढती है। अनेकों को कार्यसिद्ध होने की प्रेरणा देती है।

खयालों को ब्रह्म से तुलना कर सकते हैं। क्योंकि सोच द्वारा कई विषयों का आविष्कार होती है। यदि कोई भी सोच असफल हो, तो इसका कारण शायद इससे भी शक्तिशाली सोच इसे दबाव में रखने तक की ताकत सोच हो सकता है। हमारे खयालों में जो उच्चतर सोच हो,वो ही हमारे वर्तमान स्थिति का कारण है। यदि हमारी परिस्थिति समाधानप्रद न हों, तो हमें जरूर अपने सोच को बदलना चाहिए।सोच बदलने से जरूर सबकुछ बदलता है।यह सत्य है।

सहनशीलता तपस्समान है। तृप्ति एक सुखद अनुभव है। अन्य प्राणियों पर करूणा पूर्ण रहना उत्तम गुण माना जाता है। क्षमता एक बेहतर औजार है।

हारने पर भी, अंधकार को छेदनेवाला सूर्य किरणों की तरह जीवन में आगे बढना है। ताकतों तक नहीं बल्कि , अपने मंजिल तक।

खिले चेहरे से, भरोसे के साथ नए दिन का स्वागत करें। ईश्वर सबको अच्छे राह दिखाएँ।

🙏🙏🙏

आदि शंकराचार्य जयन्ती। 🙏।

ऊँ गुरु ब्रह्मा, गुरुर्विष्णुः, गुरु देवो महेश्वरः।

गुरू साक्षात् परब्रह्मा, तस्मै श्री गुरवे नमः।।

सदाशिव समारंभां,शंकराचार्य मध्यमां।

अस्मदाचार्य पर्यन्तां,वन्दे गुरु परंपराम्।।

श्री गुरु चरणारविन्दाभ्यां नमो नमः।🙏।।

आजकल के समय में हमलोग , जप,पूजा, अर्चना, स्तोत्र पारायण आदि को एक नियमानुसार कर रहे हैं, वो सब आदि शंकराचार्य द्वारा निर्धारित की गई है। वे ही इस सनातन धर्म का मार्गदर्शी हैं।

आज का दिन वैशाख शुक्ल पंचमी तिथि।इसी दिन श्री आदि शंकराचार्य के जन्मदिन है। इस दिन कई क्षेत्रों में इस शुभ दिन को मनाया

जा रहा है। हम भी इस समारोह में भाग लेकर, पूजा, जप, स्तोत्र पारायण करके धन्य हों।

जय जय शंकर। हर हर शंकर।।

कर्म भोग

पूर्व जन्म के कर्मों से ही हमें अपने जीवन में माता पिता, भाई बहन, पति पत्नी, सगे संबंधियों, मित्र शत्रु आदि के रिश्ते मिलते हैं। क्योंकि या तो इनसे कुछ लेना होता है या तो कुछ देना।

त्रणानुबंध: पूर्व जन्म में आप किसी से ऋण लिया हो या उसे नष्ट पहूँचाए हो, वो इस जन्म में आपके औलाद होकर आपके धन को किसी बीमारी या और किसी भी तरह आपके धन को तब तक नष्ट करेगा जब तक उसका हिसाब पूरा न हो।

शत्रु पुत्र: पूर्व जन्म के आपके दुश्मन आपसे बदला लेने के लिए इस जन्म में आपका संतान बनकर आपको जिंदगी भर सताता है, मारपीट करके या दुर्वचनों से आपको दुःखी रखकर अपने आप से खुश रहेगा।

उदासीन पुत्र: इस प्रकार के पुत्र न तो माता पिता को सुखी रखता है और बडे होने के बाद उन्हें अपने हाल पर छोड़ देता है। शादी के बाद उनसे बिछडकर अलग हो जाता है।

सेवक पुत्र: पूर्व जन्म में आप किसी की खूब सेवा की हो,वह इस जन्म में आपके पुत्र या पुत्री बनकर आएगा और आपकी सेवा करेगा।जो बोया वो ही काटेगा।

आप यह न समझें कि यह केवल मनुष्य तक ही लागू है। यदि आप किसी गाय की खूब सेवा की हो वह इस जन्म में आपके सुपुत्र होकर आपकी सेवा करेगा। यदि आप किसी जानवर को बहुत सताया हो , वही इस जन्म में शत्रुपुत्र बनकर आपको खूब सताता है।

इसलिए जीवन में किसी को भी किसी भी तरह की हानि न पहूँचाएँ। हम जो भी करते हैं, इसका असर हमें इस जन्म में ही नहीं तो अगले जन्म में भुगतना ही पडेगा। यही प्रकृति का नियम है।

जरा सोचिए, आप जन्म लेते वक्त कितना धन, संपत्ति अपने साथ लाए हो ?? जो भी हो जितना ही कमाया हो, वह सब यहीं से कमाया है और मरते समय सब कुछ यहीं पे व्यर्थ छोड़कर जाता है। मैं, मेरा, तेरा सारा यहीं धरती की है और यहीं रह जाएगी। साथ कुछ नहीं जाएगा। जाएगा तो सिर्फ हमारे नेकियाँ ही साथ जाएगा। इसलिए सदा सत्कर्म ही कीजिए।

श्री मद्भगवत्गीता।

अयोध्या पट्टणम्।

तमिलनाडु के सेलम् जिले से 11कि.मी. की दूरी पर स्थित एक सुंदर मंदिर है, अयोध्या पट्टणम्। तमिल भाषा में पट्टणम् का मतलब है, शहर। कहा जाता है कि, भगवान श्री राम लंका युद्ध के बाद, सीता माता, लक्ष्मण, सुग्रीव,हनुमान तथा विभीषण के साथ पुष्पक विमान में अयोध्या लौटते हुए जब इस जगह के ऊपर से पार कर रहे थे, तब यहाँ पर भरद्वाज मुनि का आश्रम था। उनके अनुरोध पर श्री राम जी वहाँ एक दिन के लिए ठहरे। भरद्वाज मुनि श्री राम जी से अपने को अयोध्या जाने के बाद उनके साथ होने वाले पट्टाभिषेक को देखने के लिए अपने ह्रदय की इच्छा को प्रकट की। श्री राम भी इसे स्वीकार कर के सीतामाता के साथ एक पत्थर पर बैठकर पट्टाभिषिक्त मुद्रा में दर्शन दिए। तब दोनों ओर लक्ष्मण, हनुमान, सुग्रीव तथा विभीषण खडे होकर उनको प्रणाम किए। साथ ही भरद्वाज मुनि भी।

हजारों सालों तक यह जगह जंगल के अंदर अदृश्य था। 16 वीं सदी में यहाँ पर लोग आकर बसने लगे। जंगल को हठाने के बाद लोग वहाँ पर मौजूद श्री राम को देखकर मदुरै नगर के साम्राट तिरुमलै नायकर से यहाँ पर मंदिर बनाने की अनुरोध किए।

साम्राट के आज्ञानुसार वहाँ एक बहुत ही सुंदर मंदिर की स्थापना हुई। इस शिल्पकला का वर्णन बातों में करना तो नामुमकिन है।

इस ब्लॉग के साथ कुछ तस्वीरें भी पोस्ट की हूँ।

रोशनी का शिकार

हम सब जानते ही हैं कि सूरजमुखी सूर्य की दिशा में ही अपने को घुमाती है। दूसरे शब्दों में मानें”रोशनी का शिकार” करती है। लेकिन बरसात के मौसम में जब बादलों के छाया में सूरज छिप जाता तो ये फूल क्या करते हैं?🤔

शायद यही हो सकता है कि सूरजमुखी फूल अपनी पत्तों को गिराकर नीचे झुकी होगी। लेकिन यह बिलकुल गलत है। वे फूल एक दूसरे की तरफ मुडकर अपनी ऊर्जा को आपस में बाँटकर खिल उठती हैं। कुदरत की संतुलन अनोखी होती है।

अब हमें भी इसी तरह की रोशनी हर एक की जीवन में आवश्यक होता है। जैसे कि परिवार में, दोस्तों में या तो कामों में।सीधे चलते हुए जीवन में कभी कभी बादलों की छाया की तरह कुछ व्याकुलता फैलना भी अनिवार्य है। ऐसी स्थिति में ज्यादातर लोग घबरा जाते हैं न तो तनाव में पड जाते हैं। हम क्यों न सूरजमुखी का अनुकरण करें??😎

प्रकृति एक बहतरीन आचार्य है जिसमें हर एक मुसीबत का समाधान हमें मिलता है। तो क्यों न हम अपनों के लिए संकटों में सूरजमुखी बनें???