श्री चंद्रशेखर सरस्वती स्वामी जी की कृपा।🙏🙏

  शंकराचार्य श्री चंद्रशेखर सरस्वती स्वामी जी उन दिनों में कभी कभी किसी जगह जाकर वहां के लोगों को अपने आशीर्वाद देते थे और वहीं कुछ दिन ठहर भी जाते थे। वैसे ही गुरूजी ने एक बार कर्नाटक राज्य के बेलगाम में कुछ दिन ठहरे थे। तब वहां रोज एक ग्वाला आकर‌ दूध देकर जा रहा था। लेकिन वह सदा उदास सा दीखता था। पूछने पर पता चला कि उसकी पत्नी की तबीयत ठीक नहीं है और वह कैन्सर के कारण अपनी आखरी दिन गिन रही है। डाक्टर ने भी उसे बचाने की उम्मीद छोड़ दिए।

   इस बात को जानकर एक दिन गुरूजी ने उसे अपने यहां बुलाया। उन्होंने ग्वाला से अपने बीबी की पसंदीदा खाना के बारे में पूछा। ग्वाला की बीबी मिर्च खाना बहुत पसंद करती है। तो गुरूजी ने उसे वहीं मिर्च रोज खाने को कहा।

  आश्चर्य की बात यह है कि ग्वाला की बीबी जो कई दिनों से बिस्तर से उठ नहीं पा रही थी, वह धीरे धीरे अपनी घर के कामों को करने लगी। एक महीने के बाद ग्वाला ने अपनी पत्नी को डाक्टर के पास ले गया। उसके स्केन रिपोर्ट देखकर डाक्टर अवाक् रह गये।

   डाक्टर ग्वाला से पूछा कि कौन-सा दवाई देकर वह अपनी पत्नी को ठीक किया। ग्वाला ने कहा वह सिर्फ गुरूजी पर भरोसा किया और उसकी पत्नी अपनी मनपसंद मिर्ची ही खाकर ठीक हुई है।

    गुरु शंकराचार्य श्री चंद्रशेखर सरस्वती स्वामी जी के ऐसे ढेरों भक्तों के और उनके अपने अपने परेशानियों से मुक्ति पाने के बारे में हमें, हरेक के जीवन में से , जानने को  मिलती है। वे सच में अंबा कामाक्षी देवी के स्वरूप में माने गए हैं।

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काशी यात्रा

थोड़ी दिन पहले हम अपने पूरे परिवार (जेठजी के, देवर और सम्बंधी जी के साथ) काशी यात्रा पर निकले।

पहले हमें रामेश्वर जाना चाहिए। रामेश्वर में से धनुषकोडी तक रवाना हो कर वहां संकल्प लेना है। समुद्र स्नान करके, हाथ भरके रेत लाकर , समुद्र तट पर तीन शिवलिंग बनाना है। धनुष का चित्र खींचकर सबका पूजन करना है। एक लिंग सेतु माधव, दूसरा बिंदु माधव और तीसरा वेणी माधव। सेतु माधव को समुद्र में ही विसर्जन करना है। बिंदु माधव को पुरोहित को दान में देना है। और वेणी माधव को अपने साथ प्रयागराज ले जाना है। बाद में हमें ३६बार समुद्र स्नान करना है। वैसे ही रामनाथस्वामी मंदिर जाकर वहां के २२कुएं के पानी में नहाना है। भारत देश के पवित्र नदियों का पानी इन कुआओं में मौजूद हैं। यहां हमसे किएगये पापकर्मों से विमोचन के लिए प्रार्थना करके पुरोहित के घर में पित्रुओं के लिए श्राद्ध करना है। पिंडदान देना है।

प्रयागराज— हरेक व्यक्ति को अपने जीवन में तीन तरह के ऋण से मुक्ति पाना चाहिए। प्रयागराज में आत्मरुण से मुक्ति पाना चाहिए। इसके लिए स्नान करके संकल्प लेना चाहिए। हमारे साथ लाई गई वेणी माधव को लेकर त्रिवेणी संगम जाना है। यहां गंगा, यमुना और सरस्वती नदियां एक साथ मिलकर बहतीं हैं। सरस्वती अंतर्वाहिनी है। इस संगम में स्नान करने से पहले, हमें आत्मशुद्धि के लिए मर्द लोग मुंडन करना है और औरत वेणी दान (अपने बालों की छोटी सी हिस्सा काटकर) त्रिवेणी संगम में विसर्जित करना है। यहां की चमत्कार यह है कि, वस्तुत: बाल पानी में नहीं डूबती। लेकिन इस संगम में बाल डूब जाती है। हमारे साथ लाई गई वेणी माधव को भी संगम में हमें आत्मरुण से मुक्ति देने के लिए प्रार्थना करके विसर्जन करना चाहिए। यहीं से गंगाजल स्वीकार करते हैं। बाद में पुरोहित के यहां पित्रों को श्राद्ध और पिंडदान देना चाहिए। अक्षय वटवृक्ष के झाड़ यहीं से उत्पन्न होती है।

वाराणसी। :: वरुण, असि नदियां यहां बहने के कारण वाराणसी नाम सार्थक हुआ। यह क्षेत्र भगवान शिव के त्रिशूल पर स्थित है। प्रलय काल मे भी यह क्षेत्र अचल रहती है। काशी में भगवान विश्वनाथ, विशालाक्षी,अन्नपूर्णा, भैरव आदि के मंदिर स्थित हैं। अक्षय वट के तना इस क्षेत्र में स्थित है। यहां हमें देवरुण से मुक्ति पाने के लिए पंचतीर्थ श्राद्ध करना चाहिए। पहले असि घाट से । यहां हमारे साथ पुरोहित भी नांव में आते हैं। स्नान करके पिंडदान करना चाहिए। दूसरी घाट दशाश्वमेध घाट। यहां ब्रह्मदेव ने दस अश्वमेध यज्ञ किए हैं। यहां भी स्नान और पिंडदान। तीसरा त्रिलोचन घाट ( वरुण घाट)। चौथा पंचगंगा घाट। यहां स्नान करके १०० सीढ़ियों के ऊपर स्थित बिंदु माधव का दर्शन करने के बाद, पिंडदान देना चाहिए। पांचवीं घाट मणिकर्णिका घाट। यहां भी स्नान और पिंडदान देना है। इसके बाद हम वापस अपने बसेरे में लौट आए।

गया श्राद्ध । ::। गया पित्रुरुण विमोचन स्थान है। यहां सुबह उठकर स्नान करके फल्गुनी नदी ( साल भर सूखी रहती है) के तट पर पिंडदान देना चाहिए। यहां से विष्णु पाद तक जाकर वहां फिर से विष्णु पाद पर पिंडदान देना चाहिए। फिर से अपने स्थान (पंडित जी के घर) लौटकर श्राद्ध करना चाहिए। बाद में पिंडों को लेकर अक्षय वट वृक्ष के पास पित्रुओं का तर्पण करके पिंडदान देना चाहिए। यह सब अन्न-पान के बिना करना चाहिए। गया में अक्षय वट वृक्ष का अग्र भाग हम देख सकते हैं। यहीं हम हमारे ( क्रोध, जलन, मोह, लोभ , घमंड इत्यादि दुर्गुणों को विसर्जन करना चाहिए। इसके प्रतीक के रूप में एक फल, एक तरकारी और एक पत्र (बरगद) को जीवन भर में कभी भी इस्तेमाल न करने की शपथ लेते हैं।

इसके बाद काशी वापस आकर वहां दंपति पूजा और समाराधना करना है।

फिर से रामेश्वर तक रवाना हो कर वहां रामनाथस्वामी को प्रयागराज से लिए गए गंगाजल से अभिषेक करना है। घर लौटकर गंगाजल की पूजा करने से यह काशी यात्रा समाप्त होती है।

तीन तरह के लोग।

   श्री महाविष्णु, अपने वाहन गरुड़ के साथ संभाषण कर रहे थे। तब विष्णु ने गरुड़ से पूछा कि लोग कितने तरह के होते हैं। गरुड़ विनम्रता से कहा कि, ” हे प्रभु!! आप सर्वांतर्यामी हैं और सब कुछ ठीक तरह से जानते हुए भी मुझसे कहलाना चाहते हैं। फिर भी मैं अपने दिमाग की सोच को आपसे कहता हूं।”

   मनुष्य तीन तरह के होते हैं।                            पक्षियों की तरह रहने वाले लोग। जैसे पक्षियां घोंसले बनाते हैं और इसमें अपने बच्चों को जन्म देती हैं और इन्हें खिलाती हैं। यदि सांप या अन्य कोई जानवर इनके बच्चों को खा लिया तो ये पक्षियां कुछ देर तक खिन्न रह जाती हैं और बाद में फिर से अपने दैनिक चर्या में जुट जाती हैं। इसी तरह कुछ लोग अपने ताक़त के काम करते हैं और इससे जो कुछ भी मिलती है, उसी से वैसे ही रह जाते हैं। इन्हें बेहतर जीवन-विधान की चिंता कभी भी नहीं होती।

     गाय और बछड़े जैसे लोग। गाय और बछड़े जहां भी हो , अपने मां और औलाद को ठीक तरह से पहचान सकते हैं। लेकिन ज्यादातर इन दोनों को अलग अलग ही बांधा जाता है। एक -दूसरे के पास जाने के लिए तरसते हैं, लेकिन उन्हें बांधी गई रस्सी उन्हें पास जाने से रोकती है। इसी तरह कुछ लोग ईश्वर को पहचानते हैं। लेकिन उन्हें रिश्ते नामक रस्सी भगवान तक जाने से रोकती है।

पति-पत्नी जैसे। घर के परिवार के लोगों के द्वारा की गई संबंध में , शुरू में पति अपने पत्नी की लापरवाही करता है। लेकिन वे पत्नी सब कुछ ( ख़ान बनाना, अपने को सजाना, पति की सेवा करना जैसे) अपने पति को खुश रखने के लिए करती रहती है। कई दिनों के बाद, वह पति धीरे धीरे अपनी पत्नी पर श्रद्धा लेना शुरू करता है। इसी तरह आरंभ में लोग भगवान की लापरवाही करते हैं। लेकिन काल उन्हें ईश्वर के महत्व को समझाता है। अंत में वे सदा भगवान को स्मरण करना ही अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण बात मानते हैं।

इस तरह गरुड़ ने विष्णु भगवान से अपने सोच विचार को व्यक्त किए।

कलियुग

भगवान श्री कृष्ण से, युधिष्ठिर के सिवा, बाकी ४पांडवों ने कलियुग के बारे में जानकारी देने के लिए निवेदन किए। श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए धनुष उठाए इसमें से चार तीर चारों दिशाओं में लगाए। और इन चार पांडवों से इन तीरों को लाने के लिए कहा।

अर्जुन एक ओर तीर ढूंढ लाने के लिए गया, वहां उसने जो दृश्य देखा, इससे वह बहुत दुःखी हो गया। वहां एक कोयल अपनी मीठी आवाज से गा रही थी लेकिन अपने पैरों के नीचे एक छोटी सी खरगोश को सजीव दबाकर अपने चोंच से चुभा रही थी। वह खरगोश दर्द से तड़प रहा था।

जहां से भीम अपना तीर लिया, वहां ५कुएं थे। एक कुआं बीच में से और उसके चारों तरफ चार कुएं थे जो पानी से भरपूर थे। लेकिन बीच में मौजूद कुआं बिलकुल सूखा पड़ा था। भीम को कुछ भी समझ में नहीं आया और वह भी वापस लौटा।

नकुल जहां से तीर लिया वहां एक गाय अपने बच्चे को जन्म दी और उसे जीभ से बड़ी ही प्यार से चाट रही थी। पूरी तरह साफ करने के बाद भी बहुत ही चाट रही थी। बड़ी ही मुश्किलता से लोगों ने उसे अपने बच्चे से अलग कर सके। लेकिन इतने में गाय का बछड़ा घायल हो गया था। इसपर नकुल चिंतित हो गया।

सहदेव को तीर एक पहाड़ के पास मिला। तभी पहाड़ पर से एक बड़ी पत्थर गिर रही थी। वह अपने राह के बड़े वृक्षों को गिराती हुई , नीचे की तरफ तेज से गिर रही थी। लेकिन उसकी गति को एक छोटा सा पौधा ने रोक लिया था।

पांडवों ने श्री कृष्ण से अपने द्वारा दृष्टित विषयों पर चर्चा किए। तब श्री कृष्ण मुस्कुराहट से इन सभी घटनाओं का कारण बताया। कलियुग में गुरु के रूप में कुछ लोग मीठी बोली बोलते हैं और उन्हें ज्ञान भी अधिक होती हैं लेकिन वे लोगों को शोषित कर देते हैं। जैसे अर्जुन से देखा गया कोयल मीठी आवाज से गाते हुए खरगोश को सता रही थी।

कलियुग में अमीर लोग ढेर सारे धन दौलत से भरे हुए होते हैं। उन्हीं के बीच में गरीब लोग भी रहते हैं। लेकिन वे अमीर , गरीब को एक छोटी सी भी सहायता करने को तैयार नहीं होंगे। जैसे भीम ने चार कुएं को पानी से भरपूर देखा और उन्हीं के बीच में से एक सूखा हुआ कुआं भी मौजूद था।

कलियुग में लोग अपने बच्चों पर इतना प्यार दिखाते हैं कि उसी प्यार के नाते वे बच्चे बिगड़ जाते हैं। जैसे नकुल ने देखा। गाय अपनी अतीत प्यार के कारण चाट चाट कर अपने बच्चे को घायल कर दिया था।

अंत में सहदेव जो गिरती हुई पत्थर को देखा वही कलियुग के लोगों का जीवन विधान है। लोग अपने दुर्गुणों के कारण नीचे गिरने लगते हैं और वह छोटा सा पौधा, जो पत्थर को गिरावट से रोक सकी , उसी तरह लोग अंत में केवल भगवान के स्मरण करने से हीनीचे गिरने से अपने को बचा सकते हैं।

उद्धव गीता।। श्रीमद्भागवत।।🙏🙏

हनुमानजी चिरंजीवी हुए। कैसे??

  भगवान इंद्र से लड़कर हनुमानजी बेहोश हो गए। इससे उनके पिताजी वायु दुखी हो कर उसे अपने गोद में लिए और अपने काम से विदा ले लिए।

इस कारण संसार के सभी जीव जंतुओं को सांस लेने में दिक्कत हो रही थी । इसमें देवताओं और गंधर्व भी शामिल थे। सभी मिलकर ब्रह्मा से इसकी सुझाव के लिए गए।

ब्रह्मा जी ने अपने हाथ से इस बालक को छुए और हनुमानजी उठकर बैठ गये। तभी ब्रह्मा ने सबको संबोधित करते हुए कहा कि “यही बालक भविष्य में तुम सभी को रावण जैसे राक्षसों से बचा सकता है इसलिए उसे अपने अपने ताक़त के वरदान प्रदान कीजिए।”

सूर्य भगवान ने अपने प्रकाश किरणों में से एक प्रतिशत हनुमानजी को दिए और इसके अलावा हनुमानजी को वेदशास्त्रों तथा अन्य सभी विद्या सिखाने को अपनी पूरी सम्मति दी।

वरूण भगवान ने, जल तथा वायु से हनुमानजी को किसी भी तरह की हानी न होने की वर प्रदान की। यम धर्म ने अपने दंडायुध या अन्य किसी तरह की बीमारी से पीड़ित न होने की वर दी। कुबेर ने हनुमानजी युद्ध भूमि में कभी भी थकान न होने की वर दी। भगवान शिव अपने अस्त्र तथा हाथों से हनुमानजी को कभी भी मृत्यु न होने की वचन दी। विश्वकर्मा ने अपने द्वारा किए गए शस्त्रों से हनुमानजी को कभी भी हानी न होने की वर दी। ब्रह्मा, “हनुमानजी चिरंजीवी रहेंगे और ब्राह्मणों से कभी भी उसे शाप न दी जायेगी। अपने इच्छित रूप ले सकेंगे और कहीं भी पलभर में पहुंच सकेंगे। सदा निर्भय रहेंगे और उसे असफलता कभी नहीं होगा।” जैसे वरों से वायु भगवान को शांत किए।

इन सभी बातों से संतुष्ट हो कर वायु भगवान अपने काम में जुट गए। जय श्री राम।🙏

असली/नक़ली

औरों की तरह रहने के लिए हम इनके नक़ल नहीं। हमारे ताकत को हममें ही ढूंढकर बाहर लाने से, ये पूरी दुनिया हमारी तारीफ करेंगी। हमारे पूरे ताकत को समेटकर आगे बढ़ें तो सफलता प्राप्त करना निश्चित ही है।

हमारे सोच विचार जिस तरफ हो,उसी तरफ हमारे कामकाज भी चलती है। सिर्फ हमारे लक्ष्य की ओर आगे बढ़ें तो जरूर विजय प्राप्त करेंगे।

नई विषयों का आविष्कार करनेवाले, अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्त करने हेतु अपने आप को प्रोत्साहित करके, आगे बढ़ते हैं। दूसरों को हरानै का भाव उनमें नहीं होता है। आगे बढ़ने वालों के रास्ते को, कोई ताला नहीं लगा सकते हैं।

हमें कभी भी ऐसी चिंता न हो कि, कोई हमारे साथ हाथ बांटें। हमें तो दो हाथ इसलिए हैं कि एक दूसरे का साथ दें। यदि हम अपने पूरे ताकत से अपने लक्ष्य की ओर कदम उठाने को तैयार हों, तो विजय हमारे घर के सामने आकर खड़ा हो जाता है।

हममें ज्यादातर लोगों का सोच ऐसी ही है कि, हमें कोई भी इज्ज़त नहीं दे रहें हैं और हमारे लापरवाही कर रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि हम खुद अपने आप को निम्र समझ रखें हैं। सबसे पहले हम अपने आत्मविश्वास को बढाएं ताकि हमारे सोच में सकारात्मक परिवर्तन हो।